4 जनवरी: मसीह में सन्तुष्ट

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4 जनवरी: मसीह में सन्तुष्ट
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“मैंने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ; उसी में सन्तोष करूँ। मैं दीन होना भी जानता हूँ और बढ़ना भी जानता हूँ।”  फिलिप्पियों 4:11-12

हम असन्तोष से भरे समाज में रहते हैं। विज्ञापन हमें ईर्ष्यालु बनाने के लिए प्रशिक्षित करते हैं। यद्यपि वास्तविक समस्या वह समाज नहीं है, जिसमें हम रहते हैं परन्तु हमारे अपने हृदय और मन की स्थिति है। हम उन बातों के द्वारा सन्तुष्टि से बहुत दूर कर दिए जाते हैं, जो हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए शोर मचाती हैं, जैसे कि उपाधियाँ, सम्पत्ति, प्रभाव या प्रसिद्धि। फिर भी, ये सभी और अन्य बहुत-सी ऐसी बातें हमें यह विश्वास दिलाकर कि इतना तो कभी पूरा नहीं पड़ेगा, हमें उसमें आनन्द मनाने की भावना को लूट लेना चाहती हैं, जो हमें परमेश्वर ने दिया है। और इन्हें प्राप्त कर लेने का यह प्रयास कभी खत्म नहीं होता।

यद्यपि पौलुस न केवल यह कह सकता था कि वह सन्तुष्ट था, अपितु यह भी कि वह “जिस दशा में” भी हो, वह उसमें सन्तुष्ट रह सकता है। यही तो वह चीज है, जिसको हर कोई खोज रहा है! तो फिर इसका रहस्य क्या था? यह था प्रभु यीशु मसीह की पर्याप्तता में अपनी व्यक्तिगत पहचान और जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को स्थापित करना। पौलुस ने प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते हुए धैर्य और लचीलापन बनाए रखने का समर्थन नहीं किया या आत्मनिर्भरता का कोई झूठा सुसमाचार प्रस्तुत नहीं किया। कदापि नहीं, उसका सन्तोष परमेश्वर की इच्छा के आगे अपने हृदय और मन को अधीन करने का परिणाम था, भले ही वह किसी भी परिस्थिति का सामना क्यों न करे।

सब लोग हर प्रकार की परिस्थिति में नहीं रह चुके हैं। सब लोग नहीं जानते कि किसी दूसरे की परिस्थिति में रहना कैसा होता है। परन्तु पौलुस यह जानता था। वह जानता था कि धनवान होना और पोषित होना क्या होता है, और वह जानता था कि निर्धन होना और वंचित रहना क्या होता है। यदि उसका सन्तोष परिस्थितियों का परिणाम होता तो उसका जीवन लगातार उतार-चढ़ाव भरा होता, एक क्षण वह मोहक विलासिता में चूर होता और अगले ही क्षण उस विलासिता की अनुपस्थिति से पूरी तरह पराजित। ऐसी अस्थिर आत्मा ने पौलुस को निष्क्रिय कर दिया होता, जिससे वह मसीह की सेवा करने में असमर्थ हो जाता।

पौलुस सामान्य आवश्यकताओं वाला एक सामान्य व्यक्ति था। रोम की एक कालकोठरी से तीमुथियुस को लिखे एक पत्र में पौलुस ने लिखा कि “मेरे पास शीघ्र आने का प्रयत्न कर . . . बागा . . . और पुस्तकें विशेष करके चर्मपत्रों को लेते आना” (2 तीमुथियुस 4:9, 13)। दूसरों ने उसे छोड़ दिया था और उसके पास कुछ वस्तुओं की घटी थी। हाँ, पौलुस को कपड़े, पुस्तकें और एक साथी चाहिए था। किन्तु वह जानता था कि वह इनके बिना भी ठीक से रह सकेगा, क्योंकि उसकी शान्ति उनसे किसी बड़ी बात में निहित थी।

पौलुस की तरह आपका सन्तोष भी अन्ततः यीशु के साथ आपके मेल किए जाने पर आधारित हो सकता है और ऐसा होना भी चाहिए। पूरी तरह से उसके हो जाने और पूरी तरह से उसके अधिकार के अधीन रहने के अतिरिक्त अन्य सभी महत्वाकांक्षाओं का परित्याग कर दें। जब आप मसीह को जान लेते हैं और जान जाते हैं कि वह कितना अद्‌भुत है, कि वह आपका सब कुछ है, चाँदी से अधिक मूल्यवान है, सोने से अधिक महँगा है, हीरों से अधिक सुन्दर है, और आपके पास जो कुछ भी है, वह उसके तुल्य कुछ भी नहीं है,[1] तब आपका अपनी परिस्थितियों को देखने का तरीका और आपकी सन्तुष्टि का मापदण्ड पूरी तरह से बदल जाएगा।

भजन संहिता 73.

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