“क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा; और जो कोई मेरे लिए अपना प्राण खोएगा, वह उसे पाएगा। यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?” मत्ती 16:25-26
यीशु प्रश्न पूछने में निपुण था, विशेषकर ऐसे प्रश्न जो लोगों को रुककर ध्यान देने पर बाध्य कर देते थे। जब हमारा सामना यीशु के प्रश्नों से होता है, जैसा कि यहाँ चेलों के साथ हुआ, तो हमें सावधान रहना चाहिए कि हम उनके प्रभाव को टालने का प्रयास न करें।
पहली नजर में हो सकता है कि यीशु का यह प्रश्न, जो भौतिक सफलता के लिए प्राण की हानि उठाने के बारे में है, प्राथमिक रूप से एक चेतावनी के रूप में लगे जैसे कि किसी स्वार्थी व्यक्ति पर दण्ड आने का संकेत दे रहा हो। हम यीशु के प्रश्न को इस तरह से पढ़ने के लिए प्रलोभित होते हैं, मानो वह एक माँ के समान है जो अपने बच्चे को कठोर चेतावनी देकर कह रही है, “अब यदि तुम इसे अपनी बहन के साथ नहीं बाँटोगे, तो तुम जानते हो कि क्या होगा!” परन्तु यह प्रश्न एक अवलोकन है। यीशु दिखा रहा है कि जब हम अपने जीवन और निर्णयों को अपनी पापी अभिलाषाओं, जैसे कि अपनी सम्पत्ति, अपनी उपलब्धियों, अपनी इच्छित पहचान के आधार पर दिशा देते हैं, तब क्या होता है। वह कहता है कि इस तरह से जीना अपने जीवन की हानि उठाना है।
इस कारण, यहाँ यीशु जिस जीवन की हानि की बात कर रहा है, वह तात्कालिक और अनन्त दोनों है। यदि हम जीवन को उससे प्राप्त होने वाली वस्तुओं से अधिक कुछ नहीं मानते, तो हम वास्तव में इसके सबसे बड़े आनन्द से वंचित रह जाते हैं; अन्ततः हमारा केवल अस्तित्व रह जाता है, किन्तु हम वास्तव में जी नहीं पाते। इसके अतिरिक्त, जब हम अपने आप को अपने जीवन के सिंहासन पर बिठा देते हैं, तो हम यीशु को उसके उचित स्थान से हटा देते हैं और इस वास्तविकता को स्वीकार करते हैं कि स्वाभाविक रूप से हम संसार के पीछे चलना पसन्द करते हैं, न कि हमारी इच्छाओं को छोड़कर मसीह के पीछे चलना। यदि हम इसी तरह चलते रहेंगे, तो हम अनन्त जीवन के वरदान को खो देंगे, जिसे वह अपने अनुयायियों को देना पसन्द करता है।
तो हम वर्तमान समय में सांसारिक अभिलाषाओं से कैसे लड़ सकते हैं? सबसे पहले हमें यह पहचानना होगा कि जैसे 17वीं सदी के गणितज्ञ और धर्म-विज्ञानी ब्लेज़ पास्कल ने कहा था, हमारे अस्तित्व के सबसे गहन स्तर पर परमेश्वर के आकार का एक छेद है और इस छेद को परमेश्वर के अतिरिक्त कोई भी नहीं भर सकता। हम क्षण भर के सुखों का पीछा करने के लिए नहीं, अपितु जीवित परमेश्वर के साथ सम्बन्ध का आनन्द लेने के लिए अस्तित्व में हैं। फिर दूसरा, हमें अपनी आत्माओं के मूल्य पर निरन्तर चिन्तन करना चाहिए जैसा कि यरूशलेम के बाहर उस क्रूर दृश्य में स्पष्ट है, जहाँ तिरस्कृत, बहिष्कृत, छिदे हुए, घावों से भरे हुए और ठुकराए हुए निष्पाप मसीह को क्रूस पर लटका दिया गया था, ताकि हम परमेश्वर के साथ सही सम्बन्ध में लाए जाएँ और मुक्त रूप से अनन्त जीवन प्राप्त करें। यीशु का बलिदान इस बात को उजागर करता है कि परमेश्वर के लिए हमारी आत्माओं का अनन्त भविष्य कितना महत्त्व रखता है।
यीशु को अपने उद्धारकर्ता और अपने राजा के रूप में मानना और उसके मूल्य को किसी भी सांसारिक खजाने से ऊपर स्वीकारना एक क्षणिक निर्णय नहीं है; यह एक आजीवन प्रतिबद्धता है, जिसे प्रतिदिन जीया जाता है। यदि आप तैयार हैं कि प्रतिदिन उसके क्रूस तक आएँगे, दीनता से स्वीकार करेंगे कि वह कौन हैं, और अपना जीवन, अपनी इच्छाएँ, आराम, धन उसके लिए दे देंगे, तो अब और सदा तक आपका लाभ अन्तहीन होगा। हमारे लिए बेहतर होगा कि हम अपने हर दिन के आरम्भ में अपने आप से वह प्रश्न पूछें, जो यीशु ने उस दिन सड़क पर अपने चेलों से पूछा था, यदि मैं सारे जगत को प्राप्त कर लूँ और अपने प्राण की हानि उठाऊँ तो मुझे क्या लाभ होगा?
मत्ती 16:13-27