“परमेश्वर ने मूसा से कहा, ‘मैं जो हूँ सो हूँ।’ फिर उसने कहा, ‘तू इस्राएलियों से यह कहना, “जिसका नाम मैं हूँ है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।”’” निर्गमन 3:14
कुछ संस्कृतियों में नामों के पीछे के अर्थ बहुत मायने नहीं रखते। कोई नाम हम इसलिए चुन लेते हैं, क्योंकि हमें उसका उच्चारण अच्छा लगता है, या क्योंकि वह हमारे परिवार के लिए अनमोल होता है। तथापि अन्य संस्कृतियों में नाम अपने आप में बहुत महत्त्व रखता है। उस नाम का अर्थ उस व्यक्ति के बारे में, जिसे वह नाम दिया गया है या उसे वह नाम देने वाले लोगों की आशा के बारे में कुछ स्थापित कर सकता है।
जब मूसा का जलती हुई झाड़ी में परमेश्वर से सामना हुआ, तो उसने पूछा, “जब मैं इस्राएलियों के पास जाकर उनसे कहूँ, ‘तुम्हारे पितरों के परमेश्वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है,’ तब यदि वे मुझ से पूछें, ‘उसका क्या नाम है?’ तब मैं उनको क्या बताऊँ?”” (निर्गमन 3:13)। तब परमेश्वर ने मूसा को जो नाम बताया, वह है यहोवा (जिसका अनुवाद है “मैं जो हूँ सो हूँ”)। इसमें चार अक्षर हैं जो व्यंजन हैं और इसमें कोई स्वर नहीं है। यदि हम इसका सही उच्चारण करने का प्रयास करें, तो हम पाएँगे कि यह लगभग असम्भव है। यदि आप चाहें तो यह कह सकते हैं कि यह एक अवर्णनीय नाम है।
इस तरह उत्तर देने के द्वारा परमेश्वर क्या कर रहा था? मूसा इस्राएल के लोगों को और फिरौन को एक अधिकार वाला नाम देने का अनुरोध कर रहा था और परमेश्वर ने उसे वह नाम दिया जिसका उच्चारण ही नहीं किया जा सकता। ऐसा लगता है कि मानो परमेश्वर कह रहा था कि ऐसा कोई नाम नहीं है जो मेरे अस्तित्व को पूरी तरह से व्यक्त कर सके। इसलिए उनसे कहो कि “मैं जो हूँ सो हूँ” ने तुम्हें भेजा है। फिरौन से कहो कि वह देखे कि मैं अपने लोगों के लिए क्या करता हूँ। तब वह जान जाएगा कि मैं कौन हूँ।
बाइबल न केवल परमेश्वर के उद्धार के कार्य की कहानी है, परन्तु इससे बढ़कर वह परमेश्वर के चरित्र के अनावरण की भी कहानी है। हममें से बहुत से लोग अपनी बाइबल पढ़ने के बाद प्रयुक्ति से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछने में निपुण हो चुके हैं, जैसे “यह कैसे सम्बन्धित है और कैसे लागू होता है? मेरे लिए इसका क्या अर्थ है?” ये बातें व्यर्थ या गलत नहीं हैं, किन्तु ये वे प्रमुख प्रश्न नहीं हैं जो पूछे जाने चाहिए। परमेश्वर कहानी का नायक और पुस्तक का प्रसंग है, और इसलिए प्रत्येक खण्ड से हमारा पहला प्रश्न यह होना चाहिए, “यह मुझे परमेश्वर के बारे में क्या बताता है?” बाइबल परमेश्वर के व्यवहार, चरित्र और महिमा को स्थापित करने के लिए लिखी गई थी।
हममें से बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि हमें प्रत्येक रविवार को कलीसिया से जो कुछ चाहिए वह है आमदनी, सम्बन्धों तथा किसी भी अन्य समस्याओं को हल करने के लिए कुछ किस्से या प्रेरणादायक सूचियाँ। मसीहियत के इतिहास में आज का युग ऐसा समय है, जिसमें विश्वासियों के लिए “कैसे करें” शीर्षक वाली इतनी अधिक पुस्तकें लिखी गई हैं। फिर भी, क्या हम वास्तव में अच्छा जीवन जी पा रहे हैं? ऐसा लगता है जैसे हम सब कुछ करना जानते हैं, परन्तु हम यह नहीं जानते कि परमेश्वर कौन है!
परमेश्वर ने मूसा को जो करने का बुलावा दिया था, उसे पूरा करने के लिए मूसा को यह समझना आवश्यक था कि परमेश्वर कौन था (और है)। उसे हमारे समान यह जानने की आवश्यकता थी कि परमेश्वर केवल एक नाम से कहीं अधिक है।
जब हम बाइबल को पढ़ते हैं और पूछते हैं कि “मैं परमेश्वर के बारे में क्या जान सकता हूँ?” तब हमारा जीवन बदल जाता है। जैसे-जैसे हम यह देखते जाते हैं कि परमेश्वर ने क्या किया है और अधिकता से समझने लगते हैं कि वह कौन है, तो हम उसके प्रति भय-युक्त प्रेम में और उसके लिए प्रेम में बढ़ने लगते हैं। और तभी हम अपने जीवन में उसके बुलावे को पूरा करते हुए उसकी इच्छा के अनुसार जीने में सक्षम होने पाएँगे। हम अपने अवर्णनीय रूप से विस्मयकारी परमेश्वर की महिमा की गहराई को पूर्ण रूप से कभी नहीं समझ पाएँगे, परन्तु हम अवश्य अनन्त काल तक उसे अधिकाधिक देखते जाएँगे। और जबकि हम उसका वचन पढ़ ही रहे हैं, तो उसका आरम्भ आज से ही हो सकता है।
निर्गमन 3:1-22