“तुम जो यह कहते हो, ‘आज या कल हम किसी और नगर में जाकर वहाँ एक वर्ष बिताएँगे, और व्यापार करके लाभ कमाएँगे।’ और यह नहीं जानते कि कल क्या होगा। सुन तो लो, तुम्हारा जीवन है ही क्या? तुम तो भाप के समान हो, जो थोड़ी देर दिखाई देती है फिर लोप हो जाती है। इसके विपरीत तुम्हें यह कहना चाहिए, ‘यदि प्रभु चाहे तो हम जीवित रहेंगे, और यह या वह काम भी करेंगे।’” याकूब 4:13-15
बाइबल व्यापारिक बुद्धिमत्ता या भविष्य की योजना बनाने को गलत नहीं ठहराती। परन्तु बाइबल जिसे गलत ठहराती है, वह एक घमण्डी और आत्म-केन्द्रित मनोवृत्ति है—ऐसी विचारधारा जो जान-बूझकर या अनजाने में परमेश्वर को हमारे निर्णयों और योजनाओं से बाहर रखती है। यह ऐसा दृष्टिकोण है जो उन बातों को निश्चित मानता है, जिनकी हमें कोई प्रतिज्ञा नहीं की गई है।
याकूब हमें बिना किसी झिझक के हमारे सीमित ज्ञान और समझ की सच्चाई से सामना कराता है। वह हमें स्मरण कराता है कि हमें उन बातों को स्वीकार करना चाहिए जो हम नहीं जानते। क्या हम आने वाले सप्ताहों और महीनों की योजनाएँ बनाने में सक्षम होना चाहते हैं? निश्चय ही! परन्तु याकूब यह स्पष्ट करता है कि हम तो यह भी नहीं जानते कि कल क्या होगा। यह तो घमण्ड ही है जो हमें यह मानने को प्रेरित करता है कि हमारा अगला श्वास भी निश्चित है।
इसके बाद वह हमें हमारी नश्वरता की भी याद दिलाता है। हमारा जीवन तो “भाप के समान है, जो थोड़ी देर दिखाई देती है, फिर लोप हो जाती है।” जैसे प्रातःकालीन कुहासा घास पर मँडराता है और सूर्य की पहली किरण पड़ते ही गायब हो जाता है, वैसे ही हमारा जीवन भी क्षणभंगुर है, जो अन्ततः लुप्त हो जाता है, और भविष्य की पीढ़ियों के लिए कोई चिह्न भी नहीं छोड़ता।
हमारी इस नश्वरता और सीमाओं के प्रकाश में, हमें भविष्य के विषय में किस रीति से विचार करना चाहिए? याकूब केवल हमारी घमण्डी योजनाओं को ही उजागर नहीं करता, वरन् इसका उपाय भी प्रस्तुत करता है। वह कहता है कि हमें नम्रता में योजना बनाना सीखना है, यह मानते हुए कि हम पूर्णतः परमेश्वर के संरक्षणकारी प्रावधान पर निर्भर हैं। सम्पूर्ण सृष्टि में कुछ भी—यहाँ तक कि हम भी—परमेश्वर के बिना एक क्षण के लिए भी अस्तित्व में नहीं रह सकते। जैसा कि एलेक मोट्यर ने लिखा है: “हम अपने जीवन में एक और दिन किसी प्राकृतिक आवश्यकता के कारण, या किसी यान्त्रिक नियम के कारण, या हमारे अधिकार के कारण, या फिर प्रकृति की कृपा के कारण प्राप्त नहीं करते, बल्कि परमेश्वर की प्रतिज्ञात करुणा के कारण प्राप्त करते हैं।”[1]
आने वाले कल की प्रतिज्ञा किसी को भी सुनिश्चित तौर पर नहीं दी गई है। हम उसकी योजना बना सकते हैं, परन्तु उसे नियन्त्रित नहीं कर सकते। यह केवल परमेश्वर की दया है, जो हमें प्रत्येक नए दिन में जगाती है। जब हम यह समझते हैं कि हमारा सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर की निरन्तर बनी रहने वाली अनुकम्पा में स्थिर है, तब अहंकारपूर्ण योजना बनाना एक मूर्खता ठहरती है। हम अपनी सीमाओं और जीवन की क्षणभंगुरता को अनदेखा नहीं कर सकते; परन्तु हम इन सच्चाइयों को अपनाकर अपने विचारों, अपने निर्णयों और अपने भविष्य की योजनाओं को उसकी महिमा के लिए रूपान्तरित कर सकते हैं।
इसलिए आज के दिन की, आने वाले कल की, अगले वर्ष की, और अपने जीवन के आगे के वर्षों की अपनी योजनाओं पर विचार करें। क्या आपने उनके लिए प्रार्थना की है? क्या आपने यह स्वीकार किया है कि उसकी योजनाएँ सर्वोपरि हैं, और आपकी सभी योजनाएँ केवल उसकी इच्छा पर निर्भर हैं? अब अपने सारे विचार और योजनाएँ उसके चरणों में रख दीजिए। आप भविष्य को नियन्त्रित नहीं कर सकते—परन्तु आपको इसकी आवश्यकता भी नहीं है, क्योंकि आप उसे जानते हैं जो उस पर नियन्त्रण रखता है।
मत्ती 6:25-34
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: जकर्याह 1–4; लूका 22:47-71
[1] द मैसेज ऑफ जेम्स, द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. अकैडेमिक, 1985), पृ. 162.