“जीभ भी एक आग है; जीभ हमारे अंगों में अधर्म का एक लोक है, और सारी देह पर कलंक लगाती है, और जीवन–गति में आग लगा देती है, और नरक कुण्ड की आग से जलती रहती है . . . पर जीभ को मनुष्यों में से कोई वश में नहीं कर सकता।” याकूब 3:6, 8
तीन वस्तुएँ कभी लौटकर नहीं आतीं: चला हुआ तीर, बोला हुआ शब्द और खोया हुआ अवसर। हम जो बोलते हैं, उसे वापस नहीं लिया जा सकता। इसके अतिरिक्त, हमें अपने द्वारा बोले गए प्रत्येक शब्द का न्याय के दिन लेखा देना होगा, यहाँ तक कि हमारे लापरवाह शब्दों का भी (मत्ती 12:36 देखें)। जैसा कि राजा सुलैमान ने कहा, “जो अपने मुँह की चौकसी करता है, वह अपने प्राण की रक्षा करता है, परन्तु जो गाल बजाता है उसका विनाश हो जाता है” (नीतिवचन 13:3); और “जीभ के वश में मृत्यु और जीवन दोनों होते हैं” (नीतिवचन 18:21)। हमारे शब्द प्रोत्साहित करने, पोषण करने और चंगा करने का काम कर सकते हैं। परन्तु वे झगड़े कराने, मतभेद उत्पन्न करने और हानि पहुँचाने का कारण भी बन सकते हैं। सुलैमान हमें ऐसे हानिकारक शब्दों का बहुआयामी चित्रण प्रदान करता है। वह हानि पहुँचाने वाले शब्दों को बिना सोचे-समझे बोले गए “तलवार के समान चुभने वाले” (नीतिवचन 12:18) शब्दों के रूप में वर्णित करता है। हमारे शब्द प्रायः बिना सोचे-समझे निकल जाते हैं और हम ऐसे व्यक्ति बन जाते हैं जो “बिना बात सुने उत्तर देते हैं” (नीतिवचन 18:13)। “जहाँ बहुत बातें होती हैं, वहाँ अपराध भी होता है” (नीतिवचन 10:19)।
हो सकता है कि आपने यह कहावत सुनी होगी कि लाठी और पत्थर तो हमारी हड्डियाँ तोड़ सकते हैं, किन्तु शब्द हमें कभी हानि नहीं पहुँचा सकते, किन्तु यह बात पूरी तरह गलत है। खरोचें मिट सकती हैं और उनके निशान भुलाए जा सकते हैं, परन्तु हमसे कहे गए और हमारे लिए कहे गए चोट पहुँचाने वाले शब्द लम्बे समय तक हमारे साथ रहते हैं। ये पंक्तियाँ अधिक सच बोलती हैं:
बिना सोचे-समझे बोला गया एक शब्द झगड़े को भड़का सकता है,
एक क्रूर शब्द जीवन का नाश कर सकता है,
एक कड़वा शब्द घृणा उत्पन्न कर सकता है,
एक कठोर शब्द कष्ट दे सकता है और मार सकता है।
यह अनुमान लगाना कठिन होगा कि हानिकारक शब्दों के कारण कितनी दोस्तियाँ टूट जाती हैं, कितने लोगों की प्रतिष्ठा का नाश हो जाता है, और कितने घरों की शान्ति खण्डित हो जाती है। याकूब के अनुसार ऐसे सभी बैरभाव और अपमानजनक भाषा का स्रोत कोई और नहीं परन्तु नरक ही है। हाँ, हमारी जीभ “एक आग” है और परमेश्वर के पवित्र आत्मा के कार्य के बिना “मनुष्यों में से कोई भी जीभ को वश में नहीं कर सकता।”
रुकें और सोचें कि आपने पिछले 24 घण्टों में कितने शब्दों का प्रयोग किया होगा और उनका प्रयोग कैसे किया होगा। “मृत्यु और जीवन जीभ के वश में होते हैं,” तो क्या आपके किसी शब्द ने किसी दूसरे को किसी तरह से नीचा दिखाने के द्वारा उसको हानि पहुँचाई होगी? यह एक ऐसा पाप है, जिसका पश्चाताप किया जाना चाहिए और जिससे दूर हट जाना चाहिए। क्या परमेश्वर के सामने और उस व्यक्ति के सामने, जिससे वे शब्द कहे गए थे, आपको यह कार्य करने की आवश्यकता है?
अब उन शब्दों के बारे में सोचें जो आप अगले 24 घण्टों में बोल सकते हैं। उनका उपयोग जीवन पहुँचाने के लिए कैसे किया जा सकता है? आप ऐसा व्यक्ति कैसे बन सकते हैं, जिसने “न तो पाप किया और न उसके मुँह से छल की कोई बात निकली”? इसके विपरीत, “वह गाली सुनकर गाली नहीं देता था, और दुख उठाकर किसी को भी धमकी नहीं देता था . . . वह आप ही हमारे पापों को लिए हुए चढ़ गया . . . जिससे हम पापों के लिए मरकर धार्मिकता के लिए जीवन बिताएँ” (1 पतरस 2:22-24)। याकूब 3:2-12