“क्या तुम नहीं जानते कि दौड़ में तो दौड़ते सब ही हैं, परन्तु इनाम एक ही ले जाता है? तुम वैसे ही दौड़ो कि जीतो। हर एक पहलवान सब प्रकार का संयम करता है; वे तो एक मुरझाने वाले मुकुट को पाने के लिए यह सब करते हैं, परन्तु हम तो उस मुकुट के लिए करते हैं जो मुरझाने का नहीं। इसलिए मैं तो इसी रीति से दौड़ता हूँ, परन्तु लक्ष्यहीन नहीं।” 1 कुरिन्थियों 9:24-26
नए नियम के समय पूर्वी रोमी साम्राज्य में व्याप्त यूनानी संस्कृति में खेलों की प्रतियोगिताएँ महत्त्वपूर्ण हुआ करती थीं। एक टीकाकार ने कुरिन्थुस को एक ऐसे शहर के रूप में वर्णित किया है, जहाँ लोग केवल दो वस्तुओं की माँग करते थे, रोटी और खेल।[1]
छोटे स्तर की स्थानीय प्रतियोगिताओं में कई पुरस्कार दिए जाते थे, परन्तु प्रमुख आयोजनों में केवल एक ही पुरस्कार होता था जो कि प्रायः लॉरेल (कल्पवृक्ष) या पाइन (देवदार) के मुकुट होते थे। प्रतियोगी अपने जीवन के कई महीने उन सभी बातों से दूर रहते थे, जिनका वे अन्यथा आनन्द लिया करते थे, जिनमें सम्बन्ध, भोजन वस्तुएँ और खाली समय में की जाने वाली वे सभी गतिविधियाँ शामिल होती थीं, जो उनकी जीतने की क्षमता को कम कर सकती थीं, जिससे उनकी दृष्टि कल्पवृक्ष के मुकुट पर टिकी रहे। पौलुस इस चित्रण का उपयोग करके विश्वासियों को मसीह की महिमा करने और उसके साथ एक होने के अनन्त पुरस्कार पर दृष्टि बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करता है।
विद्यालय के खुले मैदानों में होने वाली दौड़ें, जिनका आरम्भ तो एक बड़े झुण्ड के रूप में होता है, प्रायः शीघ्र ही तीन छोटे समूहों में बँट जाती हैं। इनमें से एक छोटे समूह का लक्ष्य स्वर्ण पदक जीतना होता है, उसके बाद वाले धावकों का बड़ा समूह “केवल दौड़ने” के लिए दौड़ रहा होता है, और जो पीछे रह जाते हैं वे सामान्यतः दोष ढूँढने वाली, अशान्त, आशा-रहित, दुखी आत्माएँ होती हैं। इस पद में पौलुस द्वारा प्रयुक्त शब्द “दौड़ना” का आशय न तो पीछे रह जाने वाले के रूप में दौड़ने से है, न ही बिना लक्ष्य के दौड़ने से और न ही आधे-अधूरे मन से दौड़ने से है, बल्कि पुरस्कार विजेता के रूप में दौड़ने से है। मसीहियों के रूप में हमें लक्ष्यहीन नहीं दौड़ना चाहिए। हमें स्वर्ण पदक प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए। पुरस्कार पर ध्यान देते हुए जीने के लिए बलिदान की आवश्यकता होती है। विशेष रूप से, ऐसी किसी भी इच्छा का बलिदान, जो परमेश्वर की इच्छा के विपरीत हो। पद 25 में “पहलवान” शब्द का अनुवाद यूनानी शब्द एगोनिज़ोमेनोस से किया गया है, जिससे हमें हिन्दी का “पीड़ा” शब्द मिलता है। खिलाड़ी होने का आशय है सुविधाजनक रीति से न रहने के विकल्प को चुनना। मसीही होना भी ऐसे ही विकल्प को चुनना है। क्या हम मसीह के लिए पीड़ा सहने और बलिदान देने के लिए तैयार हैं, यह जानते हुए कि तभी हम उसके लिए अच्छी तरह से जीए गए जीवन का पुरस्कार जीतने के आनन्द का अनुभव कर सकेंगे।
परन्तु हम इस तरह का बलिदान कैसे दें या इस तरह के ध्यान के साथ कैसे दौड़ें? ऐसा हम अपनी स्वयं की क्षमता या आत्म-धार्मिकता के बल पर नहीं कर पाएँगे। यह तो झूठे धर्म की आत्मा और सार है। कदापि नहीं, केवल मसीह के साथ हमारा मिलन ही हमें इस परिवर्तन के लिए सामर्थ्य और क्षमता प्रदान करता है। यीशु ने अनन्त पुरस्कार को ध्यान में रखते हुए स्वेच्छा से बलिदान हो जाने का उदाहरण प्रस्तुत किया है (इब्रानियों 12:2)। जब वह हमारे हृदय और जीवन को नया आधार प्रदान करता है, तो हम उसके लिए दौड़ते हुए और उसके पीछे चलते हुए जितनी दूर तक आनन्दपूर्वक जा सकते हैं, उसकी कोई सीमा नहीं है।
जब स्कॉटलैण्ड के रहने वाले प्रसिद्ध ओलम्पिक खिलाड़ी और मिशनरी एरिक लिडेल से उस दौड़ की योजना के बारे में पूछा गया जिसमें उन्होंने 1924 के ओलम्पिक में 400 मीटर में स्वर्ण पदक जीता था, तो उन्होंने यह उत्तर दिया था, “मैं पहले 200 मीटर जितना हो सके उतनी तेजी से दौड़ता हूँ। फिर शेष 200 मीटर के लिए परमेश्वर की सहायता से मैं और भी तेज दौड़ता हूँ।” तो फिर आज लक्ष्यहीन या धीरे-धीरे न दौड़ें, बल्कि परमेश्वर की सहायता से उसके लिए और उसकी महिमा के लिए स्वर्ण पदक पाने के लिए और भी तेज दौड़ें।
इब्रानियों 12:1-3