22 मार्च : ऐश्वर्य-पूर्ण आत्मसमर्पण

Alethia4India
Alethia4India
22 मार्च : ऐश्वर्य-पूर्ण आत्मसमर्पण
Loading
/

“तब यहूदा सैनिकों के एक दल को और प्रधान याजकों और फरीसियों की ओर से प्यादों को लेकर, दीपकों और मशालों और हथियारों को लिए हुए वहाँ आया। तब यीशु, उन सब बातों को जो उस पर आने वाली थीं जानकर, निकला और उनसे कहा, ‘किसे ढूँढ़ते हो?’ उन्होंने उसको उत्तर दिया, ‘यीशु नासरी को।’ यीशु ने उनसे कहा, ‘मैं हूँ।’ उसका पकड़वाने वाला यहूदा भी उनके साथ खड़ा था। उसके यह कहते ही, ‘मैं हूँ,’ वे पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़े।”  यूहन्ना 18:3-6

सुसमाचार के सभी लेखकों ने यीशु के जीवन की समान घटनाओं को वर्णित किया है, परन्तु उनमें से प्रत्येक घटनाक्रम यीशु की पहचान के विशेष विवरण और पहलुओं पर प्रकाश डालता है। यूहन्ना का एक उद्देश्य यह था कि वह यीशु की श्रेष्ठता को और उन सभी परिस्थितियों पर उसकी विजय प्राप्ति को स्थापित करे जो उसका अनादर करने और उसे अपमानित करने के लिए निर्धारित की गई थीं। गतसमनी के बगीचे में यीशु को बन्दी बना लिए जाने पर विचार करें। उसने अपनी इच्छा से किन्तु अधिकारपूर्वक आत्मसमर्पण किया और संसार के उद्धारकर्ता के रूप में अपनी महिमा को प्रकट किया। एक समय ऐसा था जब लोग यीशु पर एक राजा का मुकुट थोपना चाहते थे, परन्तु वह पीछे हट गया था क्योंकि वह जानता था कि सांसारिक राजपद उसके लिए नहीं था (यूहन्ना 6:15)। यहाँ जब सैनिक उस पर एक क्रूस थोपने आए, तो वह जानता था कि आगे क्या-क्या आने वाला था। वे निश्चित रूप से यह उम्मीद कर रहे थे कि इस कुख्यात गलीली बढ़ई को ढूँढने के लिए दूर-दूर तक जाना पड़ेगा। इसके विपरीत, यहाँ वह स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर रहा था, उसकी वाणी में ऐश्वर्य था, उसकी आँखों में एक भाव था और जिस प्रकार उसने अपने आप को प्रस्तुत किया था, उस उपस्थिति ने उस क्षण की गम्भीरता को बढ़ा दिया था। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वे “पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़े।”

जब यीशु ने उन लोगों के सामने आत्मसमर्पण किया जो उसे ईश-निन्दक और अपराधी मानते थे, तो उसने अपनी पहचान का इनकार नहीं किया। सच यह है कि उसने ऐसी भाषा का उपयोग किया जो उसकी दिव्य पहचान और अधिकार को व्यक्त करती थी। यीशु ने “मैं हूँ” वाक्यांश का प्रयोग न केवल सैनिकों को यह बताने के लिए किया कि वही नासरत का यीशु था, अपितु इस वाक्यांश से उसने अपनी पहचान उस परमेश्वर के रूप में भी दिखाई जो मूसा के सामने जलती झाड़ी में प्रकट हुआ था (निर्गमन 3:14)। यह वही वाक्यांश था जिसके कारण कुछ महीनों पहले उसको लगभग पथराव किए जाने की स्थिति पर पहुँचा दिया था (यूहन्ना 8:58-59), क्योंकि यह एक स्पष्ट दावा था कि वह स्वयं सर्व-विद्यमान, जीवित परमेश्वर था।

अब यहाँ यह परमेश्वर है, जो आगे बढ़कर अपने मित्रों को विरोध करने से रोक रहा है और अपने शत्रुओं को अपनी हत्या कर देने की अनुमति दे रहा है। क्यों? जब मसीह बगीचे में सामने आया तो वह न केवल अपने चेलों की रक्षा कर रहा था अपितु अपने लोगों के लिए प्रावधान भी कर रहा था। वह पापी मनुष्यों के बदले में सामने आया, उस सब की पूर्ति के रूप में जिसकी लम्बे समय से आशा की जा रही थी। वह जानता था कि वह किस ओर कदम बढ़ा रहा था, और वह यह था, “मसीह ने भी, अर्थात् अधर्मियों के लिए धर्मी ने, पापों के कारण एक बार दुख उठाया, ताकि हमें परमेश्‍वर के पास पहुँचाए” (1 पतरस 3:18)।

अपने आत्मसमर्पण और दिव्य अधिकार के संयोजन में मसीह ने क्रूस की ओर अगला कदम बढ़ाया, जहाँ उसके बलिदान ने हमारे उद्धार को जीत लिया। वह क्रूस से भागा नहीं, बल्कि दृढ़ता से उसकी ओर बढ़ा। और उसने यह आपके लिए किया।

यह बहुत ही अद्भुत बात है,

लगभग इतनी अद्भुत कि यह हो भी सके,

कि परमेश्वर का अपना पुत्र स्वर्ग से आए,

और मेरे जैसे बच्चे को बचाने के लिए मर जाए। [1]    
यूहन्ना 18:1-14

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *