17 जनवरी : शोक के समय में भी आशा हो सकती है

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17 जनवरी : शोक के समय में भी आशा हो सकती है
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“हे भाइयो, हम नहीं चाहते कि तुम उनके विषय में जो सोते हैं, अज्ञानी रहो; ऐसा न हो कि तुम दूसरों के समान शोक करो जिन्हें आशा नहीं। क्योंकि यदि हम विश्वास करते हैं कि यीशु मरा और जी भी उठा, तो वैसे ही परमेश्वर उन्हें भी जो यीशु में सो गए हैं, उसी के साथ ले आएगा।”  1 थिस्सलुनीकियों 4:13-14

आज नहीं तो कल, जब आपका कोई प्रिय जन इस जीवन को छोड़ कर चला जाएगा, तो आपको शोक का सामना करना पड़ेगा। प्रश्न यह नहीं है कि आप शोकित होंगे या नहीं; प्रश्न यह है कि आपके शोक करने का तरीका कैसा  होगा।

थिस्सलुनीके के कुछ मसीही लोग यीशु मसीह की वापसी और मृतकों के पुनरुत्थान के बारे में व्याकुल थे। उनकी समझ की कमी के कारण वे परेशान हो रहे थे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि वे उन संगी मसीहियों के बारे में क्या कल्पना करें, जो यीशु के लौटने से पहले मर गए थे? अब वे मसीही लोग कहाँ थे, और उनका क्या होगा?

पौलुस ने विश्वासियों को परमेश्वर के लोगों और बाकी मानवजाति के बीच के अन्तर को स्मरण दिलाते हुए इस प्रकार आरम्भ किया, “जिनके पास कोई आशा नहीं है।” हम भी कभी उन्हीं के समान थे; “स्मरण करो कि [हम लोग] उस समय मसीह से अलग . . . और आशाहीन और जगत में ईश्‍वररहित थे” (इफिसियों 2:12)। परन्तु अब हमें छुड़ाया गया है और परिवर्तित कर दिया गया है। हमें निराशा से आशा की ओर लाया गया है। यह बदलाव हमारे लिए एक बड़ा प्रोत्साहन होना चाहिए। यह जीवित व्यक्तिगत विश्वास ही है, जो हमें “दूसरों” से अलग करता है।

इसके अतिरिक्त, “जो सोते हैं” का उल्लेख करते हुए पौलुस विश्वासियों के लिए मृत्यु के अस्थाई स्वरूप पर बल दे रहा है; यह कोई स्थाई दशा नहीं है। फिर भी, जबकि सो जाने का रूपक हमें यह समझने में सहायता करता है कि मृत्यु के क्षण में हमारे शरीर के साथ क्या होगा, यह इस बात की सम्पूर्णता को स्पष्ट नहीं करता है कि उस क्षण में आत्मा के साथ क्या होता है। इसका उद्देश्य यह विचार व्यक्त करना नहीं है कि मृत्यु और पुनरुत्थान के बीच की अवधि में आत्मा बेसुध होती है। यीशु ने स्पष्ट रूप से सिखाया कि मृत्यु के बाद खुशी या कष्ट का एक तात्कालिक एहसास होगा (उदाहरण के लिए, लूका 16:22-24 देखें)। पवित्रशास्त्र में यह स्पष्ट है कि मृत्यु विश्वासी को उसी क्षण यीशु के निकट समृद्ध और पूर्ण अनुभव में ले जाती है (लूका 23:42-43; फिलिप्पियों 1:21-24)।

मृत्यु के अस्थाई स्वरूप के बारे में यह बात मसीही शोक की हमारी समझ को दिशा देती है। किसी शोकाकुल अविश्वासी के लिए मृत्यु केवल निराशा का नीरस विलाप और एक गहरा खालीपन लेकर आती है, जिसे कोई भी मन की कामना या कोई भी बेतुकी प्रचलित बात भर नहीं सकती। वहीं एक विश्वासी के लिए यह एक वास्तविक, आँसुओं भरा दुख तो होता है, परन्तु इसके साथ आशा का एक बड़ाई करने वाला भजन भी होना चाहिए क्योंकि जब प्रभु वापस लौटेगा, तो वह “अपने साथ उन लोगों को भी ले आएगा जो सो गए हैं।” किसी मसीही का अन्तिम संस्कार सदा के लिए विदाई देने का समय नहीं होता है, अपितु यह “फिर मिलेंगे” कहने का समय होता है। आपके प्रियजन की अनुपस्थिति अस्थाई होती है और जो पुनः मिलन होगा वह स्थाई होगा।

जब जीवन के ये सबसे गहन प्रश्न हमें निराशा की ओर ले जाना चाहें, तो हम यह जानकर विश्राम प्राप्त कर सकते हैं कि परमेश्वर का वचन सभी बातों के लिए पर्याप्त है, और इसमें मृत्यु के बारे में हमारी समझ भी सम्मिलित है। इन पदों को अपने हृदय को प्रभावित करने दें और उन्हें अपनी स्मृति में अंकित कर लें क्योंकि वह दिन आएगा जब आपको उनसे कसकर लिपटने की आवश्यकता पड़ेगी। और इन बातों को अपनी प्रार्थना बना लें, “प्रभु यीशु, मुझे आपके वचन में मग्न रहने वाला व्यक्ति बनने में सहायता करें, ताकि मैं अब किसी भ्रम या बेचैनी के साथ न जियूँ, इसके विपरीत मैं ऐसे व्यक्ति के समान जियूँ जो आपकी संगति में रहता है। मैं आपके ज्ञान से भर जाऊँ, जिससे मैं आशा के साथ जी सकूँ और आशा के साथ शोक कर सकूँ।”

1 थिस्सलुनीकियों 4:13-18

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