“मरियम मगदलीनी ने जाकर चेलों को बताया, ‘मैं ने प्रभु को देखा, और उसने मुझ से ये बातें कहीं।’” यूहन्ना 20:18
वह क्या है जो डर को विश्वास में बदल डालता है?
यीशु की क्रूस पर मृत्यु के बाद उसके चेले पूरी तरह से टूट चुके थे, और निराश तथा उत्पीड़न के डर से एक साथ इकट्ठे थे। उनमें से एक, यहूदा, पहले ही आत्महत्या करके मर चुका था। एक और, पतरस, दबाव में आकर अपने अगुवा और शिक्षक यीशु को नकार चुका था, जिसे उन्होंने निर्दयता से मारे जाते हुए देखा था। ऐसा लग रह था मानो उनकी आशाएँ और सपने उसी के साथ मर गए थे। फिर भी, कुछ ही सप्ताह बाद ये निराश लोग यरूशलेम की सड़कों पर खड़े होकर साहस के साथ ऐलान कर रहे थे कि यीशु मसीह मृतकों में से जी उठा है। इन लोगों का भयावह डर साहसिक विश्वास में कैसे बदल गया था? क्या हममें भी वही बदलाव आ सकता है? इसका उत्तर केवल मृतकों में से जी उठा यीशु है।
चेलों की यहूदी पृष्ठभूमि ने उन्हें यह विश्वास दिलाया था कि मसीह प्रकट होगा और हमेशा के लिए रहेगा। इस मान्यता के कारण आरम्भ में वे यीशु की मृत्यु से न केवल निराश हो गए थे, बल्कि यह उन्हें प्रतापी विजय के स्थान पर सम्पूर्ण पराजय प्रतीत हो रहा था। किन्तु यीशु की मृत्यु के बाद अब अचानक साहस के साथ यह प्रचार करने का, कि यीशु ही वास्तव में मसीह है, एक ही सम्भव कारण हो सकता था: उन्होंने मृतकों में से जी उठे मसीह को देख लिया था। यदि ऐसा न हुआ होता, तो वे या तो स्नेही भाव से या फिर कटु भाव से केवल इतना ही याद रखते कि यीशु उनका प्यारा शिक्षक था। एक मृत व्यक्ति में कैसी माफी और आशा प्राप्त की जा सकती है? लेकिन मृतकों में से जी उठे मसीह के साथ अब अचानक सब कुछ बदल जाता है।
बाइबल हमें प्रत्यक्ष प्रमाणों के साथ बताती है कि चेलों ने मृतकों में से जी उठे मसीह से मुलाकात की (जैसे यूहन्ना 20:11–21:23 में)। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि चेलों ने उनके ऊपर हावी हो चुके उनके विश्वास के कारण पैदा हुए भ्रम में यीशु को देखा था। लेकिन याद रखें कि आरम्भ में उन्होंने उसके जी उठने पर विश्वास नहीं किया था! वास्तव में, पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि वे बन्द दरवाजों के पीछे डर और निराशा में बैठे थे (20:19)। और यदि उन्होंने मृतकों में से जी उठे और शासन करते हुए मसीह की कल्पना कर भी ली होती, तो वे शायद ऐसे यीशु के बारे में नहीं सोचते, जो झील के किनारे पर मछली पका कर खा रहा था, जिसके शरीर पर क्रूस पर मारे जाने के निशान अभी भी थे, और जो सड़कों पर चलता था और कई तरीकों से उनसे मिलता था। न ही वे खुद को इतने डरपोक व्यक्तियों के रूप में चित्रित करते, और न ही उस समय के समाज में महिलाओं की गवाही को शामिल करते (जिसे उस संस्कृति में मान्य नहीं माना जाता था)। इसके बजाय, वे अपने को बहादुर और प्रमुख व्यक्तियों के रूप में प्रस्तुत करते, जो खाली क़ब्र के पहले गवाह थे। खाली क़ब्र के लिए कोई भी वैकल्पिक व्याख्या उस विश्वास से भी अधिक “विश्वास” की माँग करती है, जो हमें परमेश्वर के वचन में प्रकट किया गया है।
पुनरुत्थान सब कुछ बदल देता है। हमें यीशु के मृतकों में से जी उठने के आस-पास के तथ्यों पर विचार करना चाहिए—लेकिन यह हमें जो शानदार शुभ समाचार देता है, उस पर भी हमें विचार करना चाहिए। यीशु के शारीरिक पुनरुत्थान के बिना मसीही आस्था निरर्थक है; “तुम्हारा विश्वास व्यर्थ है” (1 कुरिन्थियों 15:17)। लेकिन चूंकि यीशु सचमुच मृतकों में से जी उठा है और सचमुच शासन कर रहा है, तो फिर माफी केवल उसी में मिलती है और किसी में नहीं, और आशा केवल उसी में मिलती है और किसी में नहीं। क्या आपने विश्वास की आँखों से प्रभु को मृतकों में से जी उठे हुए और शासन करते हुए देखा है? तो फिर आप, मरियम और चेलों के समान अपने सन्देहपूर्ण डर को विश्वास में बदलते हुए देखेंगे, क्योंकि आप इस आशा को अपने हृदय में और इस डरे हुए संसार में साहसिक रूप से घोषित करेंगे।
यूहन्ना 20:1-18