“शमौन पतरस ने उत्तर दिया, ‘तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है।’ यीशु ने उसको उत्तर दिया, ‘हे शमौन, योना के पुत्र, तू धन्य है; क्योंकि मांस और लहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है, यह बात तुझ पर प्रगट की है।’” मत्ती 16:16-17
जब हम सुसमाचारों को पढ़ते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जब लोग नासरत के यीशु के सम्पर्क में आते थे, तो शायद ही कभी वे सभ्य उदासीनता के साथ प्रतिक्रिया दे पाते थे। उसके शब्द और कार्य गूढ़ प्रेम और भक्ति को, परन्तु साथ ही भय और घृणा को भी प्रेरित करते थे। प्रतिक्रियाओं की ऐसी विविधता के लिए सम्भवतः क्या कारण हो सकता है?
कैसरिया फिलिप्पी के मार्ग पर, जैसा कि अक्सर ही होता था, इस बातचीत में उत्तर देते हुए पतरस बोल पड़ा, “तू मसीह है।” और यह उत्तर उसने केवल अपने लिए नहीं परन्तु दूसरों के लिए भी दिया था। यीशु की पहचान के लिए उसने जिस शब्द का प्रयोग किया, वह था ख्रीस्तोस, जिसका यूनानी में अर्थ था “मसीह” या “अभिषिक्त।” पुराने नियम में परमेश्वर ने राजाओं, न्यायियों और भविष्यद्वक्ताओं का अभिषेक किया था, किन्तु वे सभी भविष्य में आने वाले मसीह, या उद्धारकर्ता, अर्थात् परमेश्वर के अभिषिक्त की ओर संकेत करने वाले प्रतिनिधि और प्रवक्ता थे। इस कारण पतरस ने जो घोषणा की वह विशेष रूप से उल्लेखनीय थी। वह यीशु से कह रहा था कि तू ही वह है। तू वही है जिसके बारे में भविष्यद्वक्ताओं ने बात की है।
पतरस की इस बात पर यीशु का स्पष्टीकरण और भी अधिक आश्चर्यजनक है। पतरस अपने इस निष्कर्ष पर इसलिए नहीं पहुँचा था, क्योंकि वह बुद्धिमान था या उसके पास तार्किक और तर्कसंगत सोच की उन्नत क्षमता थी या क्योंकि किसी प्रेरक प्रचारक ने उसे यह बताया था। उसका यह उत्तर इसलिए सम्भव हुआ था, क्योंकि परमेश्वर पिता ने ही सचमुच उस पर यह प्रगट किया था।
हमारे विश्वास के अंगीकार के समान ही पतरस के विश्वास का अंगीकार भी उसकी अपनी क्षमता में कभी नहीं हो सकता था। विश्वास एक वरदान है, जो हमें दिया जाता है। पतरस और यीशु के बीच का यह वार्तालाप परमेश्वर के आत्मा द्वारा परमेश्वर के वचन को लेने और उसे किसी के मन और हृदय में इस प्रकार लेकर आने का एक ठोस उदाहरण है, जिससे वह यीशु के मसीह होने की घोषणा कर पाता है।
पतरस के समान यीशु को प्रभु और मसीह के रूप में घोषित करने की हमारी क्षमता हमारा अपना काम नहीं है; यह तो “परमेश्वर का दान है, और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे” (इफिसियों 2:8-9)। यदि हमारा विश्वास हमारी अपनी बौद्धिक क्षमता या भावनात्मक बुद्धिमत्ता या नैतिक भलाई का परिणाम होता, तो हम अपने में ही भरोसा रख सकते थे और इस कारण हम अपने पर घमण्ड कर सकते थे। परन्तु ऐसा होने पर अपने अच्छे दिनों में यह हमें घमण्डी बना देगा और बुरे दिनों में यह हमें निर्बल बना देगा। कदापि नहीं, हमारा विश्वास पूरी तरह से परमेश्वर के वरदान पर आधारित है और इसलिए हम अपना भरोसा उस पर रखते हैं और इस प्रकार हम अपने सबसे उत्कृष्ट दिनों में दीन रहते हैं और अपने सबसे बुरे दिनों में भरोसा रख पाते हैं। तो फिर आज कृतज्ञता के साथ आनन्दित हों, क्योंकि परमेश्वर अपने वचन की सच्चाई के द्वारा हृदयों और मनों को बदलने से प्रसन्न होता है, जिससे कि हम पतरस के साथ मिलकर यह घोषणा कर सकें, “तू ही मसीह है।”
इफिसियों 2:1-10