15 मार्च : परमेश्वर की अनन्त योजना

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15 मार्च : परमेश्वर की अनन्त योजना
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“हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्‍वर और पिता का धन्यवाद हो कि उसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आत्मिक आशीष दी है। जैसा उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों।”  इफिसियों 1:3-4

बाइबल इस बात का कोई सीधा उत्तर नहीं देती कि परमेश्वर ने अदन की वाटिका में पतन क्यों होने दिया। वह केवल इतना बताती है कि परमेश्वर सब कुछ पर नियन्त्रण रखता है, यहाँ तक कि उस घटना पर भी।

तथापि इफिसियों को लिखे पौलुस के पत्र में हमें परमेश्वर की अनन्त योजना की एक झलक दी गई है। हम देखते हैं कि परमेश्वर हमारे संसार के अस्तित्व में आने से पहले ही काम कर रहा था और पतन की घटना ने उसे चौंका नहीं दिया था। जब आदम और हव्वा के विद्रोह के परिणामस्वरूप राज्य भ्रष्ट हो गया, तो परमेश्वर पहले से जानता था कि ऐसा होगा। आदम और हव्वा के बनाए जाने से पहले, उनकी अनाज्ञाकारिता से पहले, परमेश्वर उद्धार की योजना बना चुका था।

जब हम परमेश्वर के उद्धार के कार्य के बारे में सोचते हैं जो अन्ततः क्रूस पर पूर्ण हुआ, तो हमें इसे केवल एक संकट के समय में प्रदान किए गए समाधान के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसके विपरीत, हमें क्रूस को परमेश्वर की अनन्त मंशा से जुड़ा हुआ देखना चाहिए, जिसने अनन्त काल से निश्चय किया हुआ था कि वह यीशु के माध्यम से अपने लिए एक प्रजा को बुलावा देगा और पतन के कारण जो कुछ भ्रष्ट हो चुका है उसे पुनः स्थापित करेगा।

इस योजना में परमेश्वर का उद्देश्य “उसकी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार” था और है तथा यह “उसके अनुग्रह की महिमा की स्तुति” के लिए है (इफिसियों 1:5-6)। परमेश्वर की अनन्त योजना में प्रेरणा केवल मनुष्यों को प्रसन्न करने की इच्छा नहीं थी—यद्यपि मनुष्य इस कारण से अन्ततः प्रसन्न हो जाते हैं—परन्तु यह प्रेरणा उसके नाम के लिए उसकी चिन्ता थी। उसने निश्चय किया था कि सब कुछ उसके पुत्र प्रभु यीशु के चरणों के अधीन और नियन्त्रण में लाया जाए, जैसा कि होना भी चाहिए। इस प्रकार, छुटकारे की परमेश्वर की अनन्त योजना हमारे बारे में नहीं परन्तु उसके बारे में है। यह हमें प्रभावित अवश्य करती है। यह हमें बदल अवश्य देती है। किन्तु यह सब परमेश्वर के बारे में है। जब तक सुसमाचार हमें उसकी स्तुति करने और उसके लिए जीने के लिए प्रेरित नहीं करता, तब तक हमने इसे ठीक से नहीं समझा है।

परमेश्वर इस संसार का केन्द्र है। पतन के बाद से मनुष्यों ने परमेश्वर के अधिकार को स्वीकार करने से इनकार किया है और साथ ही उसे उसके उपयुक्त स्थान से हटाने का भरसक प्रयास किया है, जिसके परिणाम विनाशकारी हुए हैं। इस वर्तमान जीवन का कोई भी भाग ऐसा नहीं है जो मृत्यु की धूल से ढका न हो, क्योंकि मनुष्य ने यह निर्धारित कर लिया है कि वह इस तथ्य को पसन्द नहीं करता कि परमेश्वर केन्द्र में है।

क्या आप अपने जीवन को पुनः व्यवस्थित करेंगे और इसके प्रत्येक पहलू की देखरेख करने के परमेश्वर के अधिकार को मान्यता देंगे? क्या आप अपनी बढ़ाई के लिए नहीं, परन्तु उसकी स्तुति के लिए और अपने उद्देश्यों के लिए नहीं, परन्तु उसके उद्देश्य के लिए जीने का चुनाव करेंगे? विरोधाभास यह है कि जब आप अपनी नहीं परन्तु उसकी महिमा खोजेंगे, तब आप उस आनन्द का अनुभव करेंगे जो उसके पुत्र को अपने जीवन का केन्द्र मानकर जीने से आता है, जिसकी योजना परमेश्वर ने आपके लिए और समस्त सृष्टि के लिए अनन्त काल से बनाई थी।      

इफिसियों 1:3-14

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