14 जून : शोक की वास्तविकता

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14 जून : शोक की वास्तविकता
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“जब यीशु ने उसको और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे, रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास और व्याकुल हुआ, और कहा, ‘तुम ने उसे कहाँ रखा है?’ उन्होंने उससे कहा, ‘हे प्रभु, चलकर देख ले।’ यीशु रोया।” यूहन्ना 11:33-35

शोक “किसी हानि को कारण जीवन को हिला देने वाला दुख है। शोक जीवन को चिथड़े-चिथड़े कर देता है; यह एक व्यक्ति को ऊपर से नीचे तक हिला देता है। यह उसे निढाल कर देता है; वह जड़ों से उखड़ने लगता है। शोक वास्तव में जीवन को पूरी तरह से नष्ट कर देने वाली हानि है।”[1] आप शायद इस अनुभव को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। मुझे याद है जब यह पहली बार मेरे जीवन में आया था, उस समय मैं किशोर था और मेरी माँ का निधन हो गया था। कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा था।

आपको विश्वासी के रूप में जीवन जीने के दौरान जल्दी ही यह पता चल जाएगा कि विश्वास हमारे जीवन में दुख और उसके भय को आने से रोकता नहीं है। पौलुस ने अपने मित्र इपफ्रुदीतुस के मृत्यु के निकट अनुभव के बारे में लिखा: “निश्चय ही वह बीमार तो हो गया था यहाँ तक कि मरने पर था, परन्तु परमेश्‍वर ने उस पर दया की, और केवल उस ही पर नहीं पर मुझ पर भी कि मुझे शोक पर शोक न हो” (फिलिप्पियों 2:27)। इपफ्रुदीतुस को खो देने के विचार ने पौलुस का दिल तोड़ दिया था। वह जानता था कि मृत्यु अन्त नहीं है, लेकिन वह यह भी जानता था कि हानि का अनुभव करने में या यहाँ तक कि उसके सम्भावित होने में वास्तविक शोक होता है।

शोक में से गुजरना कठिन होता है क्योंकि कुछ खो चुका होता है, और कुछ खुशियाँ अब कभी वापस नहीं आ सकतीं। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि शोक एक वास्तविकता है जिस पर पवित्रशास्त्र स्पष्ट रूप से बोलता है—एक ऐसी वास्तविकता जो एक दिन एक बड़े आनन्द में बदल दी जाएगी। और हम भी जानते हैं कि शोक वह वास्तविकता है जिसके साथ हमारा उद्धारकर्ता व्यक्तिगत रूप से परिचित है। जब यीशु अपने मित्र लाजर की कब्र के पास खड़ा था, तो उसने—अर्थात त्रिएकता के दूसरे व्यक्ति ने—वहाँ इकट्ठा हुए लोगों के साथ शोक व्यक्त किया। हालाँकि वह लाजर को मरे हुओं में से जीवित करने वाला था, फिर भी उसने आँसू बहाए क्योंकि वह वास्तव में शोकित था। इस दृश्य में रहस्य यह है कि यीशु हमारी मानवता के साथ इस तरह से एक हो गया था कि उसने अपने प्रिय मित्र के खो जाने पर सच में आँसू बहाए।

हालाँकि बाइबल हमें मसीह की मृत्यु और कब्र पर विजय की वास्तविकता से परिचित कराती है, लेकिन यह हमें किसी तरह के चमकदार, हृदयहीन विजयवाद की ओर नहीं बुलाती। बल्कि, जैसा कि ऐलेक मोट्यर लिखते हैं, “आँसू विश्वासियों के लिए उपयुक्त हैं—वास्तव में उन्हें और अधिक बहाने चाहिएँ, क्योंकि मसीह हर भावना के प्रति, चाहे वह खुशी हो या शोक, उन लोगों से अधिक संवेदनशील होते हैं जिन्होंने परमेश्वर की कोमल और जीवनदायक कृपा को कभी महसूस नहीं किया।”[2]

यह तथ्य कि हमारे प्रियजन, जो मसीह में सो गए हैं, अब उसके साथ हैं, हानि और अकेलेपन के दुख को हल्का तो करता है, लेकिन इसे पूरी तरह से हटा नहीं सकता। हम उस दिन का इंतजार कर रहे हैं, जब ऐसा दुख पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। जब तक वह दिन नहीं आता, तब तक हम यह जानकर सान्त्वना पा सकते हैं कि यीशु “दुखी पुरुष था, रोग से उसकी जान पहिचान थी” (यशायाह 53:3), क्योंकि हम उसे अपने आदर्श के रूप में देखते हैं, जब हम यह देखते हैं कि वह “पुनरुत्थान और जीवन” (यूहन्ना 11:25) है, और हम उसे अपनी अनन्तता के लिए देखते हैं। यह जानने से ही हमारे दिलों में दुख और आशा को साथ-साथ रहने की शक्ति मिलती है।

  यूहन्ना 14:1-7

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 25–26; मत्ती 25:1-30


[1] जेय ई. ऐडम्स, शेफर्डिंग गॉड्स फ्लॉक: ए हैण्डबुक ऑन पास्टरल मिनिस्ट्री, काऊँसलिंग, ऐण्ड लीडरशिप (ज़ोनडेरवन, 1975), पृ. 136.

[2] जे. ऐलेक मोट्यर, द मैसेज ऑफ फिलिपियंस, द बाइबल स्पीक्स टुडे (आई.वी.पी. अकेडेमिक्स, 1984), पृ. 90.

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