“फिर वे कफरनहूम में आए; और घर में आकर उसने उनसे पूछा, ‘रास्ते में तुम किस बात पर विवाद कर रहे थे?’ वे चुप रहे, क्योंकि मार्ग में उन्होंने आपस में यह वाद–विवाद किया था कि हममें से बड़ा कौन है। तब उसने बैठकर बारहों को बुलाया और उनसे कहा, ‘यदि कोई बड़ा होना चाहे, तो सबसे छोटा और सब का सेवक बने।’” मरकुस 9:33-35
प्रतिस्पर्धा जीवन का अभिन्न अंग है। किसी टीम में मित्रतापूर्ण प्रतिस्पर्धा का होना एक-दूसरे को प्रेरित करने का एक साधन बन सकता है, जिससे टीम के सदस्यों को आगे बढ़ने में या प्रभावशाली बनने में सहायता मिलती है। परन्तु जब प्रतिस्पर्धा स्वार्थ और ईर्ष्या का कारण बन जाती है, तो यह एकता को दुर्बल बना देती है।
कफरनहूम के मार्ग में यीशु चेलों को उपदेश देते हुए यह कह रहा था, “मनुष्य का पुत्र, मनुष्यों के हाथ में पकड़वाया जाएगा, और वे उसे मार डालेंगे; और वह मरने के तीन दिन बाद जी उठेगा” (मरकुस 9:31)। सम्भवतः जब यीशु उनके आगे-आगे चल रहा था, तब उसने अपने पीछे एक-दूसरे को धकेलते हुए चल रहे चेलों की बातचीत के कुछ अंश सुने होंगे। उनकी चर्चा उनकी अपनी महानता को लेकर ईर्ष्या-पूर्ण प्रतिस्पर्धा से भरी हुई थी।
वैसे तो यह किसी भी स्थिति में बातचीत का एक बुरा विषय है, परन्तु इस सन्दर्भ में विशेष रूप से यह बुरा है। यह कितनी बेतुकी बात है कि जब यीशु उन्हें अपने दुख और मृत्यु के बारे में निर्देश दे रहा था, उस समय वे अपने पद और महानता के बारे में चिन्तित थे!
यीशु ने उनसे उनकी बातचीत के बारे में पूछा कि वह इसे निर्देश देने के अवसर के रूप में उपयोग करे। एक वाक्य में ही उसने महानता के मानवीय विचारों को पूरी तरह से उलट दिया। उसके राज्य में सच्ची महानता का अर्थ अपने आप को सबसे पीछे रखना और बाकी सभी के लिए सेवक की तरह काम करना है। स्वर्गिक राज्य का राजा इसी तरह रहता था और आज भी रहता है, क्योंकि वह “इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपना प्राण दे” (मरकुस 10:45)।
यदि हम सच्चे हैं, तो जब हम इस दृश्य पर विचार करते हैं तब हम चेलों में अपने चेहरे देख सकते हैं। हम अपने विचार को उनके विचारों में गूँजते हुए सुन सकते हैं। उनके समान हम अपने आप को भी पदवियाँ पाने के लिए संघर्ष करते हुए पाते हैं। स्वार्थ से भरी प्रतिस्पर्धा अप्रत्याशित स्थानों में प्रायः सतह पर आ ही जाती है। फिर भी इसका उपचार सदैव एक ही होता है और वह है दीनता। डेविड वेल्स लिखते हैं कि हम सभी को एक ऐसी दीनता की आवश्यकता है, जो “अपने आप से उस तरह की स्वतन्त्रता दे दे, जो हमें ऐसी अवस्थाओं में रहने में सक्षम बना दे जिसमें न तो हमारी पहचान हो, न ही महत्त्व, न ही कोई शक्ति और न ही हम कहीं दिखाई देते हों, यहाँ तक कि हमें हानि का अनुभव भी होता हो, और फिर भी हमें आनन्द और खुशी मिले . . . और वह स्वतन्त्रता है यह जान सकने की स्वतन्त्रता कि हम जगत के केन्द्र में नहीं हैं, यहाँ तक कि अपने निजी संसार के केन्द्र में भी नहीं।”[1]
इस विषय को सीख पाना कठिन है। फिर भी, हममें प्रतिस्पर्धा के होने पर और दीनता न होने पर यीशु हमें छोड़ नहीं देता है। इस दृश्य में अपने चेहरे को देख पाना मानो ऐसा है, जैसे हमें यह स्मरण दिलाना कि शिष्यता के मार्ग पर चलते समय हमें लगातार परमेश्वर के अनुग्रह की आवश्यकता होती है। केवल परमेश्वर का अनुग्रह ही आपका ध्यान अपने आप से हटा सकता है और आपको अपने आप से स्वतन्त्र कर सकता है। केवल उस व्यक्ति को ताकने से ही, जो स्वर्ग की महिमा को छोड़ कर आपके लिए क्रूस पर मर गया, आपका हृदय इस प्रकार बदल सकता है कि आप सेवा करना चाहें, सेवा टहल करवाने के इच्छुक न रहें, और दूसरों की भलाई के बारे में सोचने की तुलना में अपनी प्रतिष्ठा की कम चिन्ता करें। यीशु आज आपको सेवा करने का बुलावा दे रहा है, वैसे ही जैसे वह आपकी सेवा करता है।
रोमियों 12:3-13