“दमिश्क में हनन्याह नामक एक चेला था, उससे प्रभु ने दर्शन में कहा, ‘हे हनन्याह!’ उसने कहा, ‘हाँ, प्रभु।’” प्रेरितों के काम 9:10
आप प्रतिदिन अपने यश को आकार दे रहे हैं। और एक मसीही व्यक्ति के रूप में आप प्रतिदिन मसीह के यश को भी आकार दे रहे हैं। जब हम उसके चेलों के रूप में इधर-उधर चलते-फिरते हैं, तब हमारा जीवन मसीह के बारे में क्या कह रहा होता है?
सम्भवतः हनन्याह बाइबल का एक कम जाना-पहचाना पात्र हो, किन्तु पौलुस के जीवन पर और इस कारण कलीसिया के पूरे इतिहास पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। यह मसीह के एक चेले के रूप में उसकी दैनिक समर्पित विश्वासयोग्यता का परिणाम था। जबकि हम परमेश्वर के राज्य में उपयोग किए जाने का यत्न कर रहे हैं, तो उसकी शिष्यता के तीन ऐसे गुण हैं जो हमारे अपने चरित्र और मसीह के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को आकार देने में सहायता कर सकते हैं।
सबसे पहला, जैसा कि पवित्र बाइबल में कहा गया है कि हनन्याह “एक विशेष चेला था” (तिरछे अक्षर में लिखा गया शब्द जोड़ा गया है)। वह एक ऐसा व्यक्ति था जिसे विशेष रूप से चुना गया था। पौलुस (तब शाऊल के नाम से जाना जाता था) को दमिश्क में लाने या हनन्याह को बुलाने से भी पहले, परमेश्वर ने यरूशलेम में पिन्तेकुस्त के दिन के बाद कलीसिया के बढ़ने को सम्प्रभुता में होकर व्यवस्थित किया, ताकि कलीसिया कम से कम 200 मील उत्तर में दमिश्क तक पहुँच सके जहाँ हनन्याह सहित विश्वासियों का एक समूह स्थापित किया गया। फिर इस समूह में से परमेश्वर ने विशेष रूप से हनन्याह को चुना कि वह पौलुस का मन-परिवर्तन हो जाने के बाद उसके पास जाए। परमेश्वर की सम्प्रभुता के ऐसे प्रगाढ़ प्रदर्शन से हमें यह भरोसा करने के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन मिलना चाहिए कि शायद परमेश्वर अपनी इच्छा को पूरा करने के उद्देश्य से हमें तैयार करने और उपयोग करने के लिए ऐसे तरीकों से काम कर रहा हो जो अभी तक दिखाई न दिए हों।
दूसरा, हनन्याह एक साहसिक चेला था। उसने अपना परिचय प्रभु के अनुयायी के रूप में दिया, अर्थात् दमिश्क के उसी समूह का होने के रूप में जिसे पौलुस अपने मन-परिवर्तन से पहले घात करने जा रहा था (प्रेरितों 9:1)। हनन्याह की निष्ठा किसी स्थानीय कलीसिया, किसी एक पंथ या किसी एक धार्मिक दृष्टिकोण के प्रति नहीं थी, बल्कि प्रभु यीशु मसीह के प्रति थी। इसी प्रकार यदि यीशु ने हमारे जीवन को थाम लिया है और हमें बदल दिया है, तो हमें भी इस जीवन को बदल देने वाले तथ्य को अपने तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए। जैसे हम मसीह के उद्धार को प्राप्त करने पर पाप को न कहते हैं, वैसे ही हमें अपने विश्वास के बारे में गोपनीयता को भी न कहना है। या तो हमारी शिष्यता हमारी गोपनीयता को नष्ट कर देगी, या फिर हमारी गोपनीयता हमारी शिष्यता का अन्त कर देगी।
अन्त में, हनन्याह एक समर्पित चेला था। आगे चलकर पौलुस हनन्याह के बारे में इस प्रकार से स्मरण करता है कि वह दमिश्क में रहने वाला एक ऐसा व्यक्ति था जो “व्यवस्था के अनुसार एक भक्त मनुष्य, जो वहाँ रहने वाले सब यहूदियों में सुनाम था” (प्रेरितों 22:12)। ऐसा यश पाँच मिनट या पाँच दिन में नहीं मिलता, बल्कि जीवन के उतार-चढ़ावों में से होकर जाते हुए धीरे-धीरे मिलता है। हनन्याह ने अपना पूरा जीवन परमेश्वर और उसके वचन का पालन करने के लिए समर्पित करने के द्वारा ही ऐसा यश उन्नत किया था। उसने अपने इस समर्पण को निश्चित रूप से अपने दैनिक व्यवहार और दूसरों के साथ बातचीत के माध्यम से प्रदर्शित किया होगा।
हनन्याह का जीवन हमें साधारण दिनों में छोटे-छोटे तरीकों से विश्वासयोग्य बने रहने की चुनौती देता है। सम्भव है कि एक दिन हमें प्रभु के लिए कुछ असाधारण करने के लिए बुलाया जाए, किन्तु हमें उसके लिए पूरे मन से जीने के लिए उस समय के आने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। चेले यही काम करते हैं कि साहसपूर्वक, समर्पित रूप से और दीनता के साथ वे परमेश्वर के पीछे चलते हैं और उस पर पूरी तरह से भरोसा करते हैं। चाहे आप पढ़ाई कर रहे हों, बच्चों की परवरिश कर रहे हों, अपना व्यावसायिक जीवन बनाने में लगे हों, या फिर अपना जीवन सेवानिवृत्ति और बुढ़ापे में क्यों न बिता रहे हों, परमेश्वर की महिमा के लिए यह सब विश्वासयोग्यता के साथ करने का प्रयास करें। अपना लक्ष्य बनाएँ कि आप हनन्याह के समान, अर्थात् यीशु मसीह के एक चेले के रूप में ही जाने जाएँगे।
प्रेरितों के काम 9:1-19