13 अगस्त : पश्चाताप का एक अनुस्मारक

Alethia4India
Alethia4India
13 अगस्त : पश्चाताप का एक अनुस्मारक
Loading
/

“तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्‍वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुँचा; और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया।” योना 3:5-6

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि आपके देश का राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री एक राष्ट्रीय प्रसारण में पूरे राष्ट्र से आग्रह करे कि वे अपनी हिंसक गतिविधियाँ छोड़ दें, अपनी बुराइयों से विमुख हों, और परमेश्वर की दया की याचना करें ताकि वह आकर अपने न्याय से उन्हें बचा सके? वास्तव में, योना की आँखों के सामने नीनवे में यही हुआ।

यह वास्तव में आश्चर्यजनक है कि नीनवेवासियों ने परमेश्वर पर इतनी शीघ्रता और पूर्णता से विश्वास किया। जब उन्होंने योना द्वारा दिए गए न्याय के सन्देश को सुना, तो उनकी प्रतिक्रिया व्यापक और सच्चे हृदय से हुई थी, जिसे उनके पश्चाताप के वस्त्रों से देखा जा सकता था। और इस सार्वजनिक प्रतिक्रिया के अनुरूप ही राजा ने भी प्रतिक्रिया की थी। राजा ने अपने वस्त्र बदले और अपने राजसी वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिए; उसने अपनी जगह बदली और अपने सिंहासन को छोड़कर धूल में बैठ गया; और उसने अपने शब्द बदले और पश्चाताप की घोषणा जारी कर दी।

यह यीशु के समय के लोगों, और शायद हमारे अपने समय के लोगों से बिल्कुल विपरीत है। स्वयं यीशु ने सिखाया कि नीनवेवासियों ने “योना का प्रचार सुनकर मन फिराया,” जबकि जिनसे यीशु ने बात की, उनमें से बहुतों ने यह पहचानने से इनकार कर दिया कि “देखो, यहाँ वह है जो योना से भी बड़ा है”—अर्थात स्वयं मसीह (लूका 11:32)। उन्होंने वह अस्वीकार कर दिया जो नीनवे के राजा ने समझ लिया था जब उसने कहा, वे . . . पश्चाताप करें। सम्भव है, परमेश्‍वर दया करे और अपनी इच्छा बदल दे, और उसका भड़का हुआ कोप शान्त हो जाए और हम नष्ट होने से बच जाएँ (योना 3:8-9)। राजा समझ गया था कि नीनवेवासियों के पश्चाताप का अर्थ यह नहीं था कि परमेश्वर अनिवार्य रूप से उन्हें क्षमा कर देगा। वह अब भी अनिश्चित था कि उनके पश्चाताप के साथ परमेश्वर भी अपना निर्णय बदलेगा या नहीं।

यह हमें एक महत्त्वपूर्ण सत्य की याद दिलाता है: यहाँ तक कि पश्चाताप करने वालों के पास भी परमेश्वर की स्वीकृति के लिए कोई दावा नहीं है। वे पूरी तरह से परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर होते हैं। पश्चाताप क्षमा के लिए आवश्यक है, लेकिन यह उसे अर्जित नहीं करता। जैसे कि उड़ाऊ पुत्र ने कहा था, वैसे ही सच्चा पश्चाताप करने वाला व्यक्ति भी कहता है, “पिता जी, मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्‍टि में पाप किया है। अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाऊँ” (लूका 15:18-19)। सच्चा पश्चाताप यह स्वीकार करने से आरम्भ होता है कि हम वास्तव में परमेश्वर के न्याय के योग्य हैं और हमें उसकी दया की अत्यन्त आवश्यकता है।

चूंकि “यहाँ वह है जो योना से भी बड़ा है,” इसलिए हम जान सकते हैं और घोषित कर सकते हैं कि पश्चाताप के उत्तर में हमेशा क्षमा ही मिलेगी, क्योंकि “जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा” (रोमियों 10:13)। लेकिन हमें इस गैर-यहूदी राजा से यह सीख लेना चाहिए कि हम अपने पश्चाताप या आज्ञाकारिता के द्वारा परमेश्वर को नियन्त्रित नहीं कर सकते, और यह कि सच्चा पश्चाताप केवल बाहरी नहीं बल्कि हृदय से होता है, जिसमें हमेशा हमारे दृष्टिकोण और व्यवहार में परिवर्तन शामिल होता है। यह एक ऐसा पाठ है जिसे हमें अपने मसीही जीवन के हर दिन अपनाना चाहिए—क्योंकि, जैसा कि मार्टिन लूथर ने कहा था, “जब हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह ने कहा, ‘पश्चाताप करो,’ तो उसका आशय था कि विश्वासियों का पूरा जीवन पश्चाताप होना चाहिए।”[1]

  लूका 11:29-32

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 87– 88; 1 पतरस 3


[1] द नाइनटी-फाईव थेसिस, फर्स्ट थेसिस

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *