12 फरवरी : एकता की कुंजी

Alethia4India
Alethia4India
12 फरवरी : एकता की कुंजी
Loading
/

“जिस (यीशु मसीह) में तुम भी आत्मा के द्वारा परमेश्‍वर का निवास-स्थान होने के लिए एक साथ बनाए जाते हो।”  इफिसियों 2:22

जब कोई व्यक्ति विश्वास के द्वारा मसीह के पास आता है, तो उसकी पहचान में व्यापक रूप से परिवर्तन हो जाता है। इफिसियों 2 में पौलुस ने जिस भाषा का प्रयोग किया है, उसके अनुसार एक मरा हुआ पापी अब मसीह में जीवित है; कोप की सन्तान अब परमेश्वर की सन्तान है। परन्तु यह नई पहचान केवल व्यक्तिगत नहीं है। हम में से कोई भी मसीह में अकेला नहीं है; हम सभी परमेश्वर के लोगों के साथ  उसमें हैं। यही कारण है कि इफिसियों 2 में पौलुस अनुग्रह के हमारे व्यक्तिगत अनुभव से परमेश्वर के अनुग्रह द्वारा सम्पन्न किए जाने वाले सामूहिक कार्य की ओर आगे बढ़ता है। पौलुस हमें बताता है, “तुम अब विदेशी और मुसाफिर नहीं रहे, परन्तु पवित्र लोगों के संगी स्वदेशी और परमेश्‍वर के घराने के हो गए हो” (पद 19)। मसीह द्वारा निर्मित किया जा रहा यह “एक नया मनुष्य” (पद 15) अनुग्रह के संगी वारिसों की भीड़ के साथ महिमामय रीति से घिरा होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारी व्यक्तिगत मानवीय पहचान व्यर्थ हो जाती है। हमारी पृष्ठभूमि और हमारा स्वरूप, अर्थात हमारा लिंग, जाति और व्यक्तिगत इतिहास मसीह में विलुप्त नहीं हो जाते। हम वही रहते हैं जो हम हैं, अर्थात् परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए तथा उसके उद्देश्यों के अनुसार गढ़े गए हैं। परन्तु जो बात हमें मसीह में  एक करती है, अर्थात् मसीह के साथ  हमारी एकता, वह शेष सभी बातों से बढ़कर है।

हमें सावधान रहना चाहिए कि कहीं हम यह न भूल जाएँ कि हमारी यह एकता किस कारण से हमें मिली है। कोई भी व्यक्ति अपनी पहचान के तत्वों को बाधाओं में—प्रतिष्ठा, वर्ण, वर्ग, व्यक्तित्व के प्रकार या व्यक्तिगत प्राथमिकताओं की बाधाओं में—बदल देने के प्रलोभन में गिर सकता है। मसीही होने के नाते हमें यह स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए कि ऐसी भूल हो जाना कितनी सरल बात है। यदि हम स्वयं को ऐसी गलती के लिए दोषी पाएँ, तो हमें पश्चाताप करने और उस बात के विषय में शोक करने के लिए तैयार रहना चाहिए जो परमेश्वर को पसन्द नहीं आती।

मसीही एकता की कुंजी सुसमाचार है। पौलुस जानता था कि केवल परमेश्वर ही कठोर हृदयों को नरम कर सकता है, केवल परमेश्वर ही अन्धी आँखें खोल सकता है और केवल परमेश्वर ही अलग-अलग लोगों को एक साथ लाकर उन्हें कुछ ऐसा बना सकता है, जो वास्तव में महिमामय रीति से एक हों। परमेश्वर “एक नया मनुष्य” निर्मित कर रहा है और वह उस नए मनुष्य को अपनी कलीसिया के रूप में निर्मित कर रहा है। मसीह में परमेश्वर एक “पवित्र मन्दिर” (इफिसियों 2:21) निर्मित कर रहा है, जो “आत्मा के द्वारा परमेश्‍वर का निवास-स्थान होने के लिए एक साथ बनाया जाता है।” जाति, वर्ग या प्रतिष्ठा के आधार पर पक्षपात के लिए वहाँ कोई जगह नहीं है, जहाँ परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा वास करता है। एक दिन आप अनन्त काल के लिए मसीह और उसके लोगों के साथ अपने मिलन की पूर्णता का अनुभव करेंगे; परन्तु उस काम को अभी प्रारम्भ होना आवश्यक है और होना भी चाहिए। जिस तरह से आप अपने समय का उपयोग करते हैं और जिस तरह से आप अपनी कलीसिया में अपने भाइयों और बहनों के बारे में सोचते हैं, उनके लिए प्रार्थना करते हैं और उनसे बात करते हैं, इन सब बातों के द्वारा आज आपके पास उस एकता को पोषण देने का विशेषाधिकार है।

हम दिन-प्रतिदिन निर्मित होते जा रहे हैं,

जैसे-जैसे क्षण बीतते जा रहे हैं,

हमारा मन्दिर, जिसे शायद संसार न देख सके;

अनुग्रह से प्राप्त होने वाली प्रत्येक जीत

अनन्त काल के लिए किए जा रहे हमारे निर्माण में

अपना स्थान अवश्य पाएगी।

1 कुरिन्थियों 13

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *