“तेरे पास क्या है जो तू ने (दूसरे से) नहीं पाया? और जब कि तू ने (दूसरे से) पाया है, तो ऐसा घमण्ड क्यों करता है कि मानो नहीं पाया?” 1 कुरिन्थियों 4:7
हम इसे कई तरीकों से छिपाते हुए अलग-अलग नाम देते हैं, किन्तु ईर्ष्या ऐसे इवेंजेलिकल पापों में से एक है जो प्रायः “सहनीय” माना जाता है। इसकी सम्भावना बहुत कम है कि यह आपको उन “दस सबसे अधिक किए जाने वाले” पापों की सूची में मिले जिसके विरुद्ध कोई पास्टर अपनी कलीसिया को चेतावनी देता हो या एक-दूसरे के साथ अपने संघर्षों के बारे में बात करते समय विश्वासी इसका उल्लेख प्रायः करते हों। तो भी, यह परमेश्वर की सूची में है और प्रायः पवित्रशास्त्र में इसका उल्लेख किया गया है। वास्तविकता यह है कि ईर्ष्या कुछ सबसे घिनौने पापपूर्ण व्यवहारों की सूची के बीच पाई जाती है, जिनका नए नियम की पत्रियों में उल्लेख किया गया है क्योंकि इसे बहुत गम्भीरता से लिया जाना चाहिए (उदाहरण के लिए, रोमियों 13:13 देखें)।
जब पौलुस ने कुरिन्थियों को पत्र लिखा था, उस समय से आज तक कुछ विशेष बदलाव नहीं आया है। सामान्य स्थानीय कलीसिया अभी भी ईर्ष्या के कारण बहुत अधिक अराजकता तथा विभाजन के कारण जूझ रही है और ईर्ष्या द्वारा उत्पन्न संकटों में से एक सम्भावना यह है कि हम सन्देह करने लगें कि क्या परमेश्वर जानता भी है कि वह वरदानों का वितरण किस प्रकार कर रहा है।
पौलुस कलीसिया के इन घमण्डी, विभाजित, ईर्ष्यालु सदस्यों से कहता है कि तुम्हारे पास जो कुछ भी है वह तुमने किसी दूसरे से पाया है और वरदानों का देने वाला वह जगत का सृष्टिकर्ता, गलतियाँ नहीं करता। तो फिर वे, और हम भी, इस प्रकार अहंकार पूर्वक कैसे रह सकते हैं, मानो सृष्टि का नियन्त्रण हम अधिक अच्छे ढंग से कर सकते हैं? अपनी ऊँचाई, परिधि, गति या अपनी किसी भी योग्यता को क्या हमने निर्धारित किया है? हमें किसने विशिष्ट बनाया है? परमेश्वर ने! हमारा डी.एन.ए. परमेश्वर की ओर से नियोजित है। हमारी परिस्थितियाँ ठीक वैसी ही हैं जैसी परमेश्वर ने युक्ति की है, और वह गलतियाँ नहीं करता। डाह एक पाप इसलिए है, क्योंकि यह एक ऐसा रवैया है जो कहता है कि परमेश्वर भला नहीं है या वह नहीं जानता कि हमारे लिए क्या भला है। डाह मूर्तिपूजा जैसी लगती है।
एक संगीत मण्डल के रूप में जीवन के मंच जब हम बाँसुरी जैसा एक यन्त्र बजा रहे हों और अपने से कुछ ही दूरी पर एक बड़ी तुरही को ऊँचे और शक्तिशाली स्वरों के साथ बजती हुई देखें, तब हो सकता है कि हम अपने आप से यह कहना चाहें, “कोई भी मुझे नहीं सुन पा रहा। मेरा स्वर पर्याप्त रूप से ऊँचा नहीं है।” वहीं से अपनी स्थिति के बारे में कड़वाहट की भावना और तुरही वादक के प्रति ईर्ष्या की भावना उत्पन्न होती है। परन्तु हमारी बाँसुरी जैसे वाद्य यन्त्र की ध्वनि का भी एक कारण है। यह वह वाद्य यन्त्र है जिसे हमें ही बजाना है। इसलिए इसे आनन्द से और उत्कृष्टता के साथ बजाएँ!
परमेश्वर द्वारा दिए गए वरदानों का उपयोग करने के हमारे प्रयासों में हम एक-दूसरे से ईर्ष्या क्यों करते हैं? हम अपने उस आनन्द को असन्तोष के हाथों क्यों छिन जाने देते हैं, जो उसने हमें मुक्त रूप से प्रदान किया है? उसने किसी और के लिए जो किया है, उसके कारण हम क्यों उसके प्रति अन्धे हो जाते हैं कि उसने हमारे लिए क्या किया है, विशेषकर अपनी उपस्थिति में हमें अनन्त धरोहर देने में? इस एक सत्य को हम सभी को अभ्यास करने की आवश्यकता है, “परमेश्वर ने मुझे वही दिया है जो मुझे चाहिए, मैं बिल्कुल वैसा ही रचा गया हूँ जैसी उसकी इच्छा थी, और जो कुछ उसने मुझे दिया है और जो कुछ नहीं दिया है, वह मेरे भले और उसकी महिमा के लिए है।”
ईर्ष्या को अपने ऊपर हावी न होने दें। इसके विपरीत, जिस भूमिका के लिए आपको बनाया गया है, उसे आनन्द के साथ जीएँ। क्योंकि आप उसके बनाए हुए हैं, और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिए सृजे गए हैं, जिन्हें परमेश्वर ने पहले से हमारे करने के लिए तैयार किया है और आपको वरदान में दिया है (इफिसियों 2:10)। उसको ही आज अपने लिए पर्याप्त होने दें। 1 तीमुथियुस 6:6-12