“और सब विश्वास करने वाले इकट्ठे रहते थे, और उनकी सब वस्तुएँ साझे में थीं।” प्रेरितों के काम 2:44
आस-पास के मूर्तिपूजक संसार की नजर में आरम्भिक कलीसिया के प्रति सबसे बड़ा आकर्षण था उसकी सामुदायिक जीवनशैली। ऐसा क्या था जो इतने अलग-अलग लोगों, अर्थात यूनानी और यहूदी, खतना किए हुए और खतनारहित, जंगली और स्कूती, दास और स्वतन्त्र लोगों को एक साथ जोड़ता था (कुलुस्सियों 3:11)? वह था यीशु मसीह। इन मसीहियों के इकट्ठे रहने की समानता के लिए उसके अतिरिक्त कोई वास्तविक व्याख्या नहीं थी।
उन दिनों से लेकर अब तक, कलीसिया सदैव बहुत कुछ साझे का होने के कारण एक अनूठी संगति में एकजुट रही है। पहली साझा बात है इसका साझा विश्वास। आरम्भिक कलीसिया जाति, शिक्षा, रुचियों या किसी और बात के आधार पर इकट्ठा नहीं होती थी; इसके विपरीत, वे अपने अलग-अलग जीवनों को अपने उद्धारकर्ता के रूप में यीशु मसीह को स्वीकारते हुए एक साझे विश्वास में लेकर आए। आज के समय में प्रभु भोज इसी एकता की एक स्पष्ट अभिव्यक्ति है; हमारे लिए एक ही रोटी और एक ही प्याला है, जिसमें हम एक देह के रूप में सहभागिता करते हैं। यीशु वह जीवन की रोटी है, जो हमारा पोषण करना है और हमें जोड़ता है।
दूसरी साझा बात है हमारा एक साझा परिवार। जब हम यीशु को अपना उद्धारकर्ता मान लेते हैं, तो हमें अन्य विश्वासियों के साथ उसके परिवार में सहर्ष स्वीकारा जाता है, जिसमें सब का एक ही स्वर्गिक पिता है। यह पारिवारिक बन्धन सांसारिक परिवारों से भी अधिक बढ़कर है, क्योंकि विश्वास का परिवार अनन्त परिवार है। इसी कारण, हमें अपने आत्मिक भाइयों और बहनों के हितों का ध्यान रखना चाहिए। हमारे लिए विश्वासियों के रूप में एक दूसरे से प्रेम न करना न केवल दुखद होगा, परन्तु विरोधाभासी भी होगा, क्योंकि “जो कोई परमेश्वर से प्रेम रखता है वह अपने भाई से भी प्रेम रखे” (1 यूहन्ना 4:21)।
तीसरी साझा बात है, परमेश्वर के अनुग्रह में होकर सच्ची कलीसिया एक साझी भावना का अनुभव भी करती है। हम खेल के आयोजनों में इसका एक छोटा संस्करण देख सकते हैं। प्रत्येक प्रशंसक अलग होता है किन्तु एकसाथ मिलकर वे एक साझी भावना, विश्वास और लक्ष्य साझा करते हैं। कभी-कभी वे एक साथ उत्साहित होते हैं और कभी-कभी वे एक साथ निराश होते हैं। इसी प्रकार, एक ही परिवार के सदस्य के रूप में हम एक-दूसरे के आनन्द, शान्ति, दर्द और दुख में भागीदार होते हैं। जैसा कि पौलुस ने भी कहा है, “यदि एक अंग दुख पाता है, तो सब अंग उसके साथ दुख पाते हैं और यदि एक अंग की बड़ाई होती है, तो उसके साथ सब अंग आनन्द मनाते हैं” (1 कुरिन्थियों 12:26)। उस अध्याय में पौलुस द्वारा उपयोग किया गया रूपक कलीसिया को एक देह के रूप में दर्शाता है। विश्वासियों के रूप में हम अलग-अलग हैं और हमारे गुण और निर्बलताएँ अलग-अलग हैं, और इसलिए हम एक ऐसी देह निर्मित करते हैं, जो अलग-अलग होने की तुलना में एक साथ अधिक भली रीति से काम करती है। मेरी सीमाएँ और निर्बलताएँ आपके गुणों के द्वारा पूरित होती हैं, और इसके उलटे क्रम में भी ऐसा ही है।
सभी परिवारों में कठिनाइयाँ और संघर्ष होते हैं, और हम सभी पापी हैं; इसलिए परमेश्वर के लोगों के साथ सम्बन्ध में होने के विशेषाधिकार को भूल जाना सरल होता है। अन्तिम बार ऐसा कब हुआ था कि आपने अपने पिता को अपनी कलीसिया के परिवार के लिए धन्यवाद दिया था? अन्तिम बार कब ऐसा हुआ था कि जब वे रविवार को एक साथ इकट्ठा थे, तो आप अपने भाइयों और बहनों की ओर देखकर यह जानते हुए उत्साहित हुए थे कि अनुग्रह के द्वारा आप भी इस परिवार का एक भाग हैं?
हमारा संसार, प्रेरितों के दिनों के समान ही, विभाजन और अकेलेपन से भरा है। लोग छिन्न-भिन्न, भयभीत और खोए हुए हैं। परन्तु हम, मसीह की संयुक्त देह, इस संसार को एक प्रगाढ़ संगति और अनन्तता का आशा से भरा भविष्य दे सकते हैं। जब आप लोगों को परमेश्वर के परिवार में लाते हैं, तो उनके जीवनों का हिस्सा बनने के द्वारा आपको अपने स्वर्गिक पिता के हाथ और पैर बनने का अवसर मिलता है। क्या आप इस अवसर को अपने अधिकार में लेंगे?
कुलुस्सियों 3:5-17