“और परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीष दी और पवित्र ठहराया; क्योंकि उसमें उसने सृष्टि की रचना के अपने सारे काम से विश्राम लिया।” उत्पत्ति 2:3
मानवता सृष्टि का चरमोत्कर्ष है। हम केवल उच्च श्रेणी के वानर नहीं हैं; परमेश्वर की सारी सृष्टि में से केवल हम ही उसके स्वरूप में बनाए गए हैं (उत्पत्ति 1:27)। हम एक सृष्टि हैं क्योंकि हमें एक सृष्टिकर्ता ने बनाया है, किन्तु हम सारी सृष्टि में अद्वितीय भी हैं क्योंकि हमें परमेश्वर की समानता में बनाया गया है। मनुष्य के पास वह गरिमा है, जो उससे अलग नहीं की जा सकती और परमेश्वर चाहता है कि हम अपने सृष्टिकर्ता का आदर करें और उसके साथ सम्बन्ध में बने रहें।
यदि मनुष्य सृष्टि का चरमोत्कर्ष है, तो विश्राम सृष्टि का चरम लक्ष्य है। जब परमेश्वर ने अपना सृजनात्मक कार्य पूरा किया, तो उसने विश्राम किया। इसका अर्थ यह नहीं है कि उसने अपने बनाए संसार में उपस्थित रहना या सक्रिय रहना बन्द कर दिया, अपितु इसका अर्थ यह है कि उसने सृजन के कार्य से विश्राम किया। उसमें आगे को कोई संशोधन करने या जोड़े जाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। किसी भी वस्तु को किसी कमी के कारण खोलकर फिर से बनाने की आवश्यकता नहीं थी। और परमेश्वर की महान योजना, अर्थात् मनुष्यों के लिए उसकी इच्छा यह है कि हम भी उसके साथ विश्राम के अद्भुत, निरन्तर बने रहने वाले दिन में रह सकें।
उत्पत्ति 1 में दिया गया सृष्टि के सृजन का विवरण पहले छः दिनों में से प्रत्येक के लिए “साँझ हुई फिर भोर हुआ” वाक्यांश को दोहराता है। लेकिन जब सातवें दिन की बात आती है, तो इस चक्र में बदलाव आता है। दूसरे शब्दों में, सातवाँ दिन तो एक निरन्तर चलते रहने वाला वह दिन है जिसमें परमेश्वर अपने लिए एक प्रजा को पा लेने का यत्न कर रहा है। वह मानवजाति को अपने साथ एक सम्बन्ध में लेकर आ रहा है, उनके लिए प्रावधान कर रहा है, उनकी रक्षा कर रहा है, उन्हें एक-दूसरे के साथ संगति प्रदान कर रहा है और उन्हें अपनी सृष्टि पर अधिकार दे रहा है।
जैसा कि दस आज्ञाओं में निर्देश दिया गया है कि विश्रामदिन का एक उद्देश्य इस्राएलियों को जीवन के लिए परमेश्वर के सर्वोच्च अभिप्राय के बारे में समझ प्रदान करना था (निर्गमन 20:8-11)। विश्राम करने और चिन्तन करने के द्वारा उन्हें विचार करना था कि परमेश्वर के लोगों के रूप में परमेश्वर की प्रभुता और आशीष में होकर जीने का अर्थ क्या-क्या हो सकता है।
जब यीशु लोगों को अपने पास बुलाता है, तो वह कहता है, “हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा . . . और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे” (मत्ती 11:28-29)। इब्रानियों का लेखक इस विचार को लेता है और घोषणा करता है कि “परमेश्वर के लोगों के लिए सब्त का विश्राम बाकी है” (इब्रानियों 4:9)। जो अदन की सुन्दरता में रचा गया और पतन की घटना में नष्ट हो गया, वह एक दिन पुनः स्थापित हो जाएगा जब हम परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश करेंगे। अभी हम अपने पापों को यीशु के पास लाने के विश्राम का अनुभव करते हैं जिससे कि हम उनसे छुटकारा पा सकें और अपनी चिन्ताओं को यीशु के पास लाने के विश्राम का अनुभव करते हैं जिससे कि हम उनमें सहायता पा सकें। हम एक दिन अपने सिद्ध परमेश्वर की पवित्रता से भरे हुए एक पुनर्स्थापित संसार में पुनरुत्थान के जीवन के सिद्ध विश्राम का अनुभव करेंगे। हमारे ताकते रहने को सन्तुष्टि प्रदान करने और इस संसार में हमारे सबसे अच्छे और सबसे बुरे दिनों में हमारे हृदयों के ध्यान को फिर से उन्मुख कर देने की आशा यही है। एक दिन हम वास्तव में शान्ति में विश्राम करने पाएँगे।
जैसे-जैसे हम इस भविष्य की ओर बढ़ते जा रहे हैं, तो परमेश्वर का आदर्श ही वह आदर्श होना चाहिए जिसका हम अनुकरण करते हैं। जैसा कि परमेश्वर ने आज्ञा दी है, हमें विश्रामदिन को पवित्र मानने के लिए स्मरण रखना है और उन सभी बातों पर विचार करने के लिए समय निकालना है जो वह हमारे लिए चाहता है, उसके साथ सहभागिता के जीवन का आनन्द लेने के लिए समय निकालना है और उसके साथ उस कार्य में लगना है जब वह सक्रिय रूप से ऐसे लोगों को पा लेने का यत्न कर रहा है जिसे वह अपनी प्रजा कह सके।
भजन संहिता 8