1 मई : प्रत्येक वरदान के साथ परमेश्‍वर की महिमा करना

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1 मई : प्रत्येक वरदान के साथ परमेश्‍वर की महिमा करना
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“इसलिए तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्‍वर की महिमा के लिए करो।”1 कुरिन्थियों 10:31

नाटकीय घटनाएँ प्रायः हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं। गोल्फ के मैदान में “होल-इन-वन” अर्थात एक ही शॉट में गेंद को छेद में डालने या बास्‍केटबॉल कोर्ट में बज़र-बीटर अर्थात आखरी घण्टी बजने से ठीक पहले गेंद को बास्केट में डालने के बारे में सोचें। छेद के पास से गेंद को आसानी से गेंद को छेद में डालना और सामान्य अथवा नियमित रूप से गेंद को बास्केट में डालना अक्सर इन अद्‌भुत क्षणों के आगे फीके पड़ जाते हैं।

यही बात कलीसिया में आत्मिक वरदानों के सन्दर्भ में भी हो सकती है। हम अधिक दिखने वाले और अधिक प्रभावशाली वरदानों—जैसे कि शिक्षा देना या नेतृत्व करना—पर ध्यान लगाकर उन वरदानों की अनदेखी कर सकते हैं जो उतने स्पष्ट नहीं दिखते—जैसे सहायता करना या प्रबन्ध करना। परन्तु हमें यह समझना आवश्यक है कि आत्मिक वरदान केवल इसलिए मूल्यवान नहीं कि वे नाटकीय हैं। मसीह की देह में सिर से पाँव तक प्रत्येक अंग अनिवार्य है, और प्रत्येक विश्वासयोग्य सदस्य का प्रत्येक वरदान महत्त्वपूर्ण है (1 कुरिन्थियों 12:14-20)। प्रत्येक वरदान महत्त्वपूर्ण है और प्रत्येक वरदान मायने रखता है।

हमारे बाहरी आत्मिक प्रदर्शन यह सिद्ध नहीं करते कि हम परमेश्‍वर को प्रसन्न कर रहे हैं, न ही वे हमारे उद्धार की गारण्टी देते हैं। यह मन को झकझोर देने वाला विचार है! हम अक्सर अपने कर्मों को अपनी वास्तविक दशा का प्रमाण समझ लेते हैं। जब हम सिखाते हैं, सहायता करते हैं, दान देते हैं, बोलते हैं, गाते हैं, सृजन करते हैं या चंगा करते हैं, तब हम प्रलोभित हो सकते हैं कि इन्हीं कार्यों को अपने आत्मिक जीवन का अन्तिम प्रमाण मान लें। परन्तु यीशु के अनुसार, अच्छे कार्यों के अद्‌भुत प्रदर्शन भी यह सिद्ध नहीं करते कि हम उसे सचमुच जानते हैं या वह हमें जानता है (मत्ती 7:21-23)।

तो क्या ऐसा कुछ है जिसे हम अपने विश्वास के प्रमाण रूप में देख सकते हैं? प्रेरित पौलुस हमें 1 कुरिन्थियों 6:19-20 में एक सरल और गहन कसौटी देता है: “तुम अपने नहीं हो क्योंकि दाम देकर मोल लिए गए हो, इसलिए अपनी देह के द्वारा परमेश्‍वर की महिमा करो।” जब आप परमेश्‍वर की सेवा करते हैं और अपने वरदानों का उपयोग करते हैं, तो आपका लक्ष्य क्या होता है? आपका उद्देश्य क्या होता है? हम इस पृथ्वी पर रहते हुए पूर्णतः शुद्ध उद्देश्यों की अपेक्षा नहीं कर सकते, परन्तु जब हम उस महान मूल्य को स्मरण करते हैं जिस पर हमें खरीदा गया, तो हम यह लक्ष्य बना सकते हैं कि प्रत्येक कार्य में उसकी महिमा करें। यही वास्तविक विश्वास का भरोसेमन्द प्रमाण है—क्योंकि सच्चा मसीही वही है जिसे मालूम है कि उसे पाप और मृत्यु से मसीह के लहू की कीमत पर छुटकारा मिला है, और जो अब अपने सम्पूर्ण अस्तित्व से परमेश्‍वर की सेवा करना चाहता है—“सब कुछ परमेश्‍वर की महिमा के लिए” करता है।

यह प्रसिद्ध, प्रभावशाली नेता पर उतना ही लागू होता है जितना कि शान्त, अनदेखे परिश्रम करने वाले पर। आपके पास जो भी वरदान हों, जो भी भूमिका हो, जो भी परिस्थिति हो—आपका उद्देश्य यह हो कि सब कुछ परमेश्‍वर की महिमा के लिए करें। जब यह आपका लक्ष्य होगा, तो आप न केवल परमेश्वर की और बेहतर सेवा करेंगे, परन्तु उसी गहन और विपरीत-बुद्धि सत्य को अनुभव करेंगे, जो कहती है, “लेने से देना धन्य है” (प्रेरितों 20:35)। आज यह लक्ष्य बनाएँ कि प्रत्येक क्षण अपने आप से पूछें: “यहाँ अभी सब कुछ उस परमेश्‍वर की महिमा के लिए करना कैसा लगेगा, जिसने मुझसे प्रेम किया और अपने आपको मेरे लिए दे दिया?”

  मीका 6:6-8

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: गिनती 9–11; प्रकाशितवाक्य 18

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