20 नवम्बर : धन्यवाद से अभिभूत होना

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20 नवम्बर : धन्यवाद से अभिभूत होना
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“उसी में चलते रहो, और उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते जाओ; और जैसे तुम सिखाए गए वैसे ही विश्‍वास में दृढ़ होते जाओ, और अधिकाधिक धन्यवाद करते रहो।” कुलुस्सियों 2:6-7

यदि हम एक भरे हुए गिलास को लेकर चल रहे हों और अचानक कोई हमसे टकरा जाए, तो जो कुछ भी उस गिलास में है, वही बाहर निकलेगा। यही सिद्धान्त हमारे चरित्र पर भी लागू होता है: यदि हमारे भीतर कड़वाहट, कृतघ्नता, ईर्ष्या या जलन भरी हुई है, तो थोड़ा-सा “धक्का” ही इन भावनाओं को बाहर लाने के लिए पर्याप्त होता है।

जब पौलुस ने कुलुस्से के मसीही विश्वासियों को लिखा, तो उसने उन्हें इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे एक आभारी हृदय से पहचाने जाएँ—जो कि मसीही जीवन की एक प्रमुख विशेषता है। पौलुस ने इस धन्यवाद को व्यक्त करने के लिए जिस शब्द का उपयोग किया है, “अधिकाधिक” (कुलुस्सियों 2:7), वह यूनानी शब्द perisseuo है, जिसका अर्थ होता है “बहकर निकलना” या “उफन पड़ना।” पौलुस का तात्पर्य स्पष्ट है: जब लोग इन विश्वासियों से “टकराएँ,” तो जो बाहर निकले वह कृतज्ञता होनी चाहिए।

जब स्त्री-पुरुष मसीह द्वारा परिवर्तित नहीं होते, तो उनके जीवन में अक्सर कृतघ्नता का ही शासन होता है—और उसके फलस्वरूप कड़वाहट, शिकायत, क्रोध और द्वेष भी उनमें भरा रहता है। परन्तु मसीह में विश्वासियों का जीवन इस प्रकार बदलता है कि वे कृतघ्नता की जगह धन्यवाद, कड़वाहट की जगह आनन्द, और क्रोध की जगह शान्ति को अपनाते हैं। हमने परमेश्वर की सम्पूर्ण सच्चाई में प्रकट हुए अनुग्रह की खुशखबरी को सुना है और मन फिराकर तथा विश्वास करके उसकी ओर लौटे हैं। हमारे पाप क्षमा कर दिए गए हैं। हमारे भीतर उसका आत्मा वास करता है। हम परमेश्वर की कलीसिया में एक नए परिवार का हिस्सा हैं। हमारे सामने अनन्त जीवन है। हम प्रार्थना के द्वारा स्वर्गिक सिंहासन तक पहुँच सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, हमारे पास आभारी होने के लिए काफी कुछ है। कृतज्ञता मसीही जीवन का गीत बन जाती है—जो भीतर से उफनता रहता है।

इस प्रकार की कृतज्ञता के गहरे प्रभाव होते हैं। यह हमारी दृष्टि को परमेश्वर की ओर मोड़ देती है और हमें स्वयं पर तथा अपनी परिस्थितियों पर केन्द्रित रहने से हटा देती है। यह हमें शैतान की कानाफूसी से बचाती है, जो हमें निराशा की ओर खींचती है और परमेश्वर की कही बातों पर अविश्वास करने को प्रेरित करती है। यह हमें घमण्ड से भी सुरक्षित रखती है, और हमारे शब्दकोश से ऐसे वाक्य मिटा देती है जैसे—“मुझे इससे ज्यादा मिलना चाहिए था” या “मेरे साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था।” और यह हमें इस सच्चाई में विश्राम करने देती है कि परमेश्वर अपनी प्रेमपूर्ण योजना को केवल सुखद और उत्साहवर्धक अनुभवों में ही नहीं, बल्कि अस्थिर और पीड़ादायक परिस्थितियों में भी पूरा करता है। केवल अनुग्रह के द्वारा ही हम यह सीख सकते हैं: “हर बात में धन्यवाद करो” (1 थिस्सलुनीकियों 5:18, अतिरिक्त बल दिया गया है)।

कृतघ्नता का एकमात्र इलाज मसीह के साथ मेल में ही पाया जाता है। क्या आप अपने भीतर यह अनुभव करते हैं कि परमेश्वर ने आपको जो नहीं दिया, उसके लिए कोई कड़वाहट या असन्तोष अब भी बाकी है? तो उस भावना को मसीह के चरणों में ले आएँ, मसीह से क्षमा माँगें, और उससे यह प्रार्थना करें कि वह आपको दिखाए कि उसने अपने सुसमाचार में आपको कितना कुछ निशुल्क दे दिया है। हर दिन कुछ समय निकालें और परमेश्वर से प्राप्त आशिषों को लिखें और उन्हें स्वयं को याद दिलाएँ। तब आप वास्तव में कृतज्ञता से उफनने लगेंगे।

भजन 103

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 28–29; लूका 4:31-44 ◊

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