13 नवम्बर : प्रभु में सहमति

Alethia4India
Alethia4India
13 नवम्बर : प्रभु में सहमति
Loading
/

“मैं यूओदिया को भी समझाता हूँ और सुन्तुखे को भी, कि वे प्रभु में एक मन रहें। हे सच्चे सहकर्मी, मैं तुझ से भी विनती करता हूँ कि तू उन स्त्रियों की सहायता कर, क्योंकि उन्होंने मेरे साथ सुसमाचार फैलाने में, क्लेमेंस और मेरे अन्य सहकर्मियों समेत परिश्रम किया, जिनके नाम जीवन की पुस्तक में लिखे हुए हैं।” फिलिप्पियों 4:2-3

विभाजन कलीसियाओं को भीतर से खोखला कर देता है।

इसी कारण पौलुस ने फिलिप्पी की कलीसिया की दो स्त्रियों—युओदिया और सुन्तुखे—के आपसी मतभेद की खबर को गम्भीरता से लिया। उसने अपने पत्र में उन्हें समझाया कि “वे प्रभु में एक मन रहें।” और इस असहमति को सम्बोधित करते हुए प्रेरित पौलुस हमें मेल-मिलाप का एक उपयोगी आदर्श प्रस्तुत करता है। वह स्पष्ट करता है कि हमें यह याद रखना चाहिए कि हम “प्रभु में” अपने भाइयों और बहनों से जुड़े हुए हैं। यह वाक्यांश हमारी असली पहचान को दर्शाता है: हम अपने नहीं हैं; हम मसीह के हैं।

इसलिए पौलुस युओदिया और सुन्तुखे से आग्रह करता है कि वे “प्रभु में” अपनी एकता को याद करें और परमेश्वर की उस शिक्षा के अधीन हो जाएँ जो प्रेरितों के द्वारा आई थी—वैसे ही जैसे आज हम बाइबल के माध्यम से परमेश्वर के वचन के अधीन होते हैं। बाइबल यह स्पष्ट करती है कि मसीही जीवन में हमें पहले परमेश्वर से प्रेम करना है और उसकी सेवा करनी है। और जब हम उसे प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं, तो वह हमारे हृदयों में ऐसा कार्य करता है कि हम अपने पड़ोसियों की भलाई के लिए उनकी सेवा करने की लालसा रखते हैं, ताकि उन्हें उन्नति मिले (रोमियों 15:2)।

जब हम यह भूल जाते हैं कि हम पूरी तरह मसीह के हैं, तो हम जल्दी ही अपने स्वार्थों को बढ़ावा देने लगते हैं, अपने उद्देश्यों को स्थापित करने लगते हैं, अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने लगते हैं, और अपने घमण्ड पर सवार होकर उनसे झगड़ने लगते हैं जो हमसे असहमत हैं। विश्वासियों के बीच कलह हमें अक्सर छोटी-छोटी बातों में उलझा देती है, जो केवल विवाद में पड़े लोगों की नहीं बल्कि पूरी कलीसिया की ऊर्जा को समाप्त कर देती हैं। परिणामस्वरूप, कलीसिया बाहर की ओर हाथ बढ़ाने की बजाय अन्दर की ओर केन्द्रित हो जाती है। यह अत्यन्त असंगत बात है कि हम जबरदस्ती अपनी बात मनवाने की कोशिश करें, जबकि हमारा उद्धारकर्ता कभी ऐसा नहीं करता था। यदि यीशु भी हमारी तरह स्वार्थी भाव से अपने बारे में सोचता, तो न तो वह देहधारण करता, न क्रूस पर मरता, न हमें क्षमा मिलती, और न ही स्वर्ग की कोई आशा होती।

हमें यह दिखावा नहीं करना चाहिए कि विश्वासियों के बीच असहमति नहीं होती—वह होती है। लेकिन छुड़ाए गए लोगों के समूह के रूप में हमें “प्रभु में” अपनी एकता की नींव पर खड़े होकर असहमतियों को हल करना है। हमारा ध्यान हमारे स्वयं पर केन्द्रित नहीं रह सकता। टूटे हुए सम्बन्धों को चंगा करने में हमें मसीह का अनुकरण करते हुए मेल-मिलाप की पहल करनी चाहिए।

यह हम सभी के लिए एक बुलाहट है। यदि आज आप युओदिया और सुन्तुखे की स्थिति में हैं, तो आपके लिए बुलावा स्पष्ट है, भले ही यह चुनौतीपूर्ण हो: “प्रभु में एक मन रहें।” चाहे और कुछ भी विभाजित करता हो, मसीह में आपकी एकता उससे कहीं अधिक गहरी है। और यदि आप ऐसी कलीसिया में हैं जहाँ युओदिया और सुन्तुखे हैं, तो आपसे भी वही भूमिका निभाने की अपेक्षा की गई है, जो पौलुस ने अपने “सच्चे साथी” से करने को कहा था: जो विभाजित हैं, उन्हें मेल कराने में सहायता करें। सच्चा प्रेम पहल करता है। सच्चा प्रेम हस्तक्षेप करता है। सच्चा प्रेम विभाजन को बढ़ने नहीं देता, बल्कि उस एकता के लिए प्रयास करता है जो कलीसिया को मजबूत करती है।

यूहन्ना 17:1-26

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 7–9; लूका 1:21-38

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *