“जब तुम मेरा कहना नहीं मानते तो क्यों मुझे ‘हे प्रभु, हे प्रभु,’ कहते हो? जो कोई मेरे पास आता है और मेरी बातें सुनकर उन्हें मानता है, मैं तुम्हें बताता हूँ कि वह किसके समान है : वह उस मनुष्य के समान है, जिसने घर बनाते समय भूमि गहरी खोदकर चट्टान पर नींव डाली।” लूका 6:46-48
यीशु चाहता है कि हमारे मुख की बातें और जीवन का व्यवहार एक-दूसरे के अनुरूप हों। इसलिए वह अपने “मैदानी उपदेश” के अन्त में एक बहुत ही टटोलने वाला प्रश्न पूछता है: “जब तुम मेरा कहना नहीं मानते तो क्यों मुझे ‘हे प्रभु, हे प्रभु,’ कहते हो?” यीशु ने देखा कि लोग जो कह रहे थे और जो कर रहे थे, उसमें गहरा विरोधाभास था। इसलिए उसने उन्हें एक गहन आत्मिक मूल्यांकन का बुलावा दिया—जो बुलावा वह आज हमें भी देता है। जैसा वह उनके लिए चाहता था, वैसा ही वह हमारे लिए भी चाहता है कि हमारे मुख से निकलने वाली यीशु में विश्वास की घोषणा के साथ-साथ हमारे जीवन में उसके प्रति नैतिक आज्ञापालन भी दिखे।
यीशु ने यह नहीं सिखाया कि स्वर्ग के राज्य में प्रवेश आज्ञाकारिता के अच्छे कामों के द्वारा होता है। उद्धार केवल परमेश्वर के अनुग्रह से, केवल विश्वास के द्वारा, और बिना किसी अन्य चीज़ के मिलता है (इफिसियों 2:8)। हम मसीह के पास केवल एक ही चीज़ लेकर आते हैं—हमारा पाप, जिससे हमें क्षमा की आवश्यकता है। तो फिर यीशु क्या सिखा रहा है? बहुत सीधी बात: केवल उन्हीं लोगों ने सच में यीशु की बात को सुना है और सुसमाचार से परिवर्तित हुए हैं, जो उसकी आज्ञा मानते हैं—अर्थात जो अपने विश्वास को अपने कर्मों के द्वारा व्यक्त करते हैं। जैसा सुधारवादियों ने कहा था: “उद्धार अकेले विश्वास से होता है, लेकिन उद्धार देने वाला वह विश्वास अकेला नहीं होता।” प्रेरित यूहन्ना भी यीशु की बात को दोहराते हुए अपनी पहली चिट्ठी में लिखता है: “यदि हम कहें कि उसके साथ हमारी सहभागिता है और फिर अन्धकार में चलें, तो हम झूठे हैं और सत्य पर नहीं चलते” (1 यूहन्ना 1:6)। बाइबल हमें बार-बार दिखाती है कि हम यीशु की बातों को जैसे सुनते हैं और उनका पालन करते हैं, उसका महत्त्व अनन्तकाल तक जाता है, क्योंकि यह हमारे विश्वास की सच्ची अवस्था और वास्तविकता को प्रकट करता है।
किसी भी मात्रा में धार्मिक कर्मकाण्ड या आध्यात्मिक बातें हमारे गुप्त व्यवहार को परमेश्वर से छिपा नहीं सकते। प्रेरित पौलुस बहुत स्पष्ट रूप से कहता है: “जो कोई प्रभु का नाम लेता है, वह अधर्म से बचा रहे” (2 तीमुथियुस 2:19)। हम इस आदेश की मांग की गम्भीरता को कम करने का प्रयास न करें। यही असली विश्वास का प्रमाण है।
यद्यपि कोई भी मनुष्य सिद्ध जीवन नहीं जीता, तौभी हम सभी को एक बदला हुआ जीवन जीने के लिए बुलाया गया है। हम अब मसीह के प्रभुत्व के अधीन हैं। उसका आत्मा हममें वास करता है। क्या हम पूरी तरह सफल होंगे? नहीं। लेकिन हम भिन्न होंगे, और हमारे जीवन में यह निरन्तर दिखेगा कि हम “मूरतों से परमेश्वर की ओर फिरे हैं, ताकि जीवते और सच्चे परमेश्वर की सेवा करें” (1 थिस्सलुनीकियों 1:9)। इसलिए अपने जीवन पर विचार करें। क्या आप यीशु को “प्रभु” कहते हैं? बहुत अच्छा! लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है: क्या आप अपने जीवन में कोई ऐसा प्रमाण दिखा सकते हैं—उन बातों में जो आप नहीं करते, उन कामों में जो आप करते हैं, उन प्रलोभनों में जिनसे आप लड़ते हैं, उन गुणों में जिन्हें आप पाने का प्रयास करते हैं, और उस क्षमा में जिसे आप पश्चात्ताप पूर्वक मांगते हैं—कि यीशु वास्तव में आपका प्रभु है?
याकूब 2:14-26
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 20–21; यूहन्ना 12:27-50