“हे पत्नियो, अपने-अपने पति के ऐसे अधीन रहो जैसे प्रभु के।” इफिसियों 5:22
“अधीनता” शब्द अक्सर तरह-तरह की नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है। इसका एक कारण यह है, जैसा कि जॉन स्टॉट ने 40 साल पहले लिखा था, “आज के युग में अधिकार की अधीनता में आने का विचार पुराना हो चुका है। यह वर्तमान समय की स्वच्छन्दता और स्वतन्त्रता की मानसिकता से पूरी तरह मेल नहीं खाता।”[1] बीते दशकों में अधीनता की नकारात्मक छवि और भी गहरी हो गई है, जिसे विशेष रूप से विवाह के सन्दर्भ में देखा जा सकता है।
फिर भी यह तथ्य बना हुआ है कि यदि इसे सही रूप में समझा और लागू किया जाए, तो सम्बन्धों के केन्द्र में अधीनता ही होती है, जैसा कि परमेश्वर ने उन्हें स्थापित किया है। बच्चे अपने माता-पिता के अधीन होते हैं (इफिसियों 6:1), कलीसिया के सदस्य अपने अगुवों के अधीन होते हैं (इब्रानियों 13:17), और इसी प्रकार पत्नियाँ अपने पतियों के वैसे ही अधीन होती हैं, “जैसे प्रभु के” (इफिसियों 5:22)। हमारे जीवन में हमें जिन भूमिकाओं के लिए बुलाया गया है, उनके अनुसार दूसरों की अधीनता में आना हमारे सम्बन्धों का एक स्वाभाविक भाग है। इस दृष्टि से, एक पत्नी का अपने पति की अधीनता में आना विवाह के लिए परमेश्वर की दिव्य व्यवस्था को प्रतिबिम्बित करता है। लेकिन हमें इस शिक्षा को कैसे समझना चाहिए?
पहली बात, पत्नी को अपने पति की अधीनता में होने की आज्ञा का अर्थ यह नहीं कि वह अपने पति से कम मूल्यवान या हीन है। बाइबल स्पष्ट रूप से सिखाती है कि पुरुष और स्त्री दोनों समान सम्मान के योग्य हैं, क्योंकि दोनों ही परमेश्वर के स्वरूप में सृजे गए हैं (उत्पत्ति 1:27)। विश्वासियों के रूप में, हम छुटकारे में भी समान हैं—और यह समानता इस बात में प्रकट होती है कि हम परमेश्वर के अनुग्रह के संयुक्त उत्तराधिकारी हैं (1 पतरस 3:7)। परमेश्वर के सामने पुरुषों और स्त्रियों की स्थिति पूरी तरह से समान है। भूमिका में अन्तर का अर्थ मूल्य में अन्तर नहीं होता।
दूसरी बात, पत्नियों को अपने-अपने पति के अधीन होने के लिए कहा गया है, न कि सभी पुरुषों के अधीन। पौलुस समाज में महिलाओं की स्थिति को लेकर कोई सामान्य आदेश नहीं दे रहा है, बल्कि वह परिवार में पत्नी की भूमिका के बारे में एक विशिष्ट निर्देश दे रहा है। इस सन्दर्भ में, पत्नी का प्रभु की अधीनता में आना उसके अपने पति की अधीनता में आने के द्वारा प्रकट होता है।
तीसरी बात, यह अधीनता अंधी और बिना शर्त आज्ञाकारिता नहीं है। पति अपनी पत्नियों को बलपूर्वक अधीनता के लिए बाध्य नहीं कर सकते, और न ही वे उनसे कोई भी ऐसी माँग कर सकते हैं जो प्रभु की इच्छा के विरुद्ध हो। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि पत्नी को अपने पति के हर आदेश को बिना किसी प्रश्न के मानना होगा। इसके विपरीत, पति को “अपनी पत्नी से अपने समान प्रेम” रखना है, उसके लिए अपना जीवन देना है और उसे पवित्रता में अगुवाई करनी है (इफिसियों 5:33)। यदि आप पति हैं, तो आपके लिए यह समझना आवश्यक है कि यदि आप अपनी पत्नी को मसीह की आज्ञा मानने से रोकने या उससे दूर ले जाने का प्रयास करते हैं, तो उसे बाइबल के अनुसार आपका अनुसरण करने की कोई बाध्यता नहीं है।
यदि आप पत्नी हैं, तो बाइबल आपको अंधी और दासत्व जैसी आज्ञाकारिता के लिए नहीं बुलाती। बल्कि, आपकी अधीनता एक आनन्दमयी निष्ठा और अपने पति के नेतृत्व का अनुसरण करने की प्रतिबद्धता होनी चाहिए—एक पारस्परिक सहभागिता का हिस्सा, जो हर बात में परमेश्वर की महिमा को खोजती है। सम्पूर्ण हृदय से, बिना किसी अनिच्छा के की गई यह अधीनता केवल परमेश्वर की शक्ति से सम्भव है, ताकि आप अपने पति से “अपने जीवन के सारे दिनों में बुरा नहीं, वरन् भला ही व्यवहार” करें (नीतिवचन 31:12)।
बाइबल पर आधारित यह अधीनता निश्चित रूप से आज के संसार में लोकप्रिय नहीं है। यह अक्सर आसान भी नहीं होती। लेकिन परमेश्वर और उसके लोगों की दृष्टि में यह अत्यन्त सुन्दर है।
नीतिवचन 31:10-31
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 140–142; 2 कुरिन्थियों 12 ◊
[1] द मैसेज ऑफ इफिशियंस: द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. अकेडेमिक, 1979), पृ. 215.