21 अगस्त : अब और तब

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21 अगस्त : अब और तब
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“क्योंकि मेरे लिए जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है। पर यदि शरीर में जीवित रहना ही मेरे काम के लिए लाभदायक है तो मैं नहीं जानता कि किसको चुनूँ। क्योंकि मैं दोनों के बीच अधर में लटका हूँ; जी तो चाहता है कि कूच करके मसीह के पास जा रहूँ, क्योंकि यह बहुत ही अच्छा है, परन्तु शरीर में रहना तुम्हारे कारण और भी आवश्यक है।” फिलिप्पियों 1:21-24

क्या आपको याद है जब बचपन में आप अपने रिश्तेदारों से मिलने जाया करते थे? शायद कुछ मुलाकातें ऐसी थीं जिनका आपको डर रहता था क्योंकि जिनसे आप मिलने जा रहे थे, वे आपके करीबी नहीं थे या आप उनके साथ सहज महसूस नहीं करते थे। लेकिन फिर कुछ विशेष मुलाकातें भी थीं, उन लोगों के साथ जिन्हें आप वास्तव में प्यार करते थे। शायद उनके दरवाजे पर पहुँचकर आपका स्वागत आपको गले से लगाकर किया जाता हो या ताज़ा बेक किए हुए कुकीज़ की खुशबू से किया जाता हो। आप उनसे मिलने के लिए उत्साहित रहते थे! वे आपके लिए अनमोल थे, और आप उनकी उपस्थिति में रहने के लिए उत्सुक रहते थे।

प्रेरित पौलुस के लिए ऐसा व्यक्ति स्वयं यीशु था। पौलुस कैद में रहते हुए भी आनन्दित रहता था, क्योंकि मसीह उसके लिए इतना महत्त्वपूर्ण था। वह उस समय की प्रतीक्षा में था, जब उसे यीशु की उपस्थिति में बुलाया जाएगा। यीशु उसके लिए सब कुछ था।

क्या आप और मैं यीशु के बारे में ऐसा कह सकते हैं? या फिर हमारी खुशी केवल सांसारिक चीज़ों पर आधारित है—जैसे हमारी शादी, बच्चे, आजीविका, या प्रभाव? यदि आपकी आत्मा की सारी उत्तेजना और आपकी पहचान केवल सांसारिक चीज़ों में ही बंधी हुई है, तो यीशु के साथ होने की चाहत फीकी पड़ जाती है। इसलिए यह याद रखना बुद्धिमानी होगी कि हमारी असली पहचान उसी में है, क्योंकि एक दिन हमें बाकी सब कुछ पीछे छोड़ना होगा।

आपने शायद यह कहावत सुनी होगी कि कोई व्यक्ति इतना अधिक स्वर्गिक विचारों में लीन हो सकता है कि वह पृथ्वी पर किसी काम का न रहे। लेकिन हम इतने सांसारिक विचारों में भी उलझ सकते हैं कि स्वर्ग के लिए बेकार हो जाएँ। कई बार, हमें यह इच्छा होती है कि हमें अभी और यहीं पर सम्पूर्ण स्वास्थ्य, दुखों का अन्त और एक निश्चिन्त जीवन मिल जाए। लेकिन वास्तविकता यह है कि हमें प्रियजनों को खोना पड़ेगा, अस्पतालों से डरावनी रिपोर्टें मिलेंगी, और हमें निराशा व आपदाओं का सामना करना पड़ेगा। यह सब हमारे “अभी” का हिस्सा है। इस पत्र में पौलुस की दुविधा थी कि “अभी” और “आगे” के बीच सन्तुलन कैसे बनाए रखा जाए। हालाँकि वह इस संसार से जाने की लालसा रखता था, लेकिन यह इसलिए नहीं था कि वह अपनी वर्तमान परिस्थितियों से भागना चाहता था। निस्सन्देह उसने कई कठिन परीक्षाओं का सामना किया, लेकिन उसके लिए स्वर्ग केवल सांसारिक पीड़ा से राहत नहीं था। वह जीवन से बचकर मृत्यु की ओर भाग नहीं रहा था, बल्कि वह यीशु के साथ रहने की अभिलाषा कर रहा था क्योंकि वह जानता था कि वह अनुभव कितना अद्‌भुत होगा।

वर्तमान में विश्वासयोग्य जीवन जीते हुए यीशु के साथ होने की वास्तविकता की प्रतीक्षा करना हम सभी के लिए सीखने योग्य बात है। पौलुस जानता था कि जब तक उसके भीतर साँस थी, तब तक उसे अपने सांसारिक कार्यों को निष्ठापूर्वक पूरा करना था, जब तक कि मसीह उसे स्वर्ग में अपने पास न बुला ले। इसलिए कुछ समय निकालकर यीशु को उसकी सम्पूर्ण प्रेमपूर्ण महिमा में देखते हुए चिन्तन करें। फिर इस महान सच्चाई का आनन्द लें कि एक दिन वह अपनी महिमा में आपका स्वागत करेगा। और फिर यह विचार करें कि उस क्षण तक पहुँचने का द्वार मृत्यु ही है। यही आपका भविष्य है। एक दिन, यह आपका वर्तमान होगा। और तब तक, आप वही कर सकते हैं जो पौलुस ने किया—मसीह के लिए पूर्ण समर्पण के साथ जीवन जीएँ, यह जानते हुए कि मृत्यु केवल लाभ ही होगी।

2 तीमुथियुस 4:6-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 107–109; गलातियों 6

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