20 अगस्त : चुनाव का क्षण

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20 अगस्त : चुनाव का क्षण
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“विश्‍वास ही से मूसा ने सयाना होकर फ़िरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इनकार किया। इसलिए कि उसे पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्‍वर के लोगों के साथ दुख भोगना अधिक उत्तम लगा।” इब्रानियों 11:24-25

हम एक ही समय में संसार के दोस्त और परमेश्वर के दोस्त नहीं हो सकते (याकूब 4:4)। जो लोग इस मध्य मार्ग पर चलने की कोशिश करते हैं, वे एक न एक दिन अवश्य समझ जाते हैं कि यह कितना निरर्थक और व्यर्थ है: और क्रिस क्रिस्टोफर्सन के शब्दों में यह हमें “एक चलता-फिरता विरोधाभास” बना देता है।[1]

फिरौन की बेटी के दत्तक पुत्र के रूप में मूसा को सामाजिक स्थिति, शारीरिक आराम और भौतिक सम्पत्ति का आनन्द मिला। एक इस्राएली के रूप में फिरौन के दरबार से बाहर उसे केवल गुमनामी, दरिद्रता और गुलामी ही मिलती। मूसा जानता था कि फिरौन के दरबार में रहना उसके लिए हर सांसारिक दृष्टिकोण से बेहतर होता। वह यह सोच सकता था कि इससे उसे परमेश्वर के लोगों के पक्ष में प्रभाव डालने का मौका मिलेगा, जो तब सम्भव नहीं होगा यदि वह दरबार को छोड़कर उनके साथ जा मिलता है।

लेकिन मूसा फिरौन के परिवार में नहीं रुका। इसके बजाय, उसने मिस्र की नागरिकता के लाभों को त्याग दिया और एक दीन-हीन, तिरस्कृत, उत्पीड़ित समूह के साथ एक हो गया, जिनके पास कोई राजनीतिक अधिकार नहीं थे। क्यों? कोई क्यों इतने कम को अपनाने के लिए इतने अधिक को छोड़ देगा?

उत्तर यह है कि मूसा ने महसूस किया कि वह परमेश्वर के लोगों और मिस्रियों के साथ एक ही समय में एक नहीं हो सकता। वह जान गया था कि वह या तो अपने लोगों के साथ गुलाम होगा या फिरौन के दरबार में समझौता करने वाला बनकर रहेगा। यह नहीं हो सकता था कि एक ओर तो वह कहे कि वह एक इस्राएली था जो अपने पूर्वजों के परमेश्वर में विश्वास करता था और साथ ही एक मिस्री के रूप में भी जीवन जीए।

हमें बताया गया है कि मूसा ने “मसीह के कारण” अपमान और कठिनाई को चुन लिया (इब्रानियों 11:26)—उस एक के लिए, जो हव्वा के वंश और अब्राहम के परिवार से आने पर था और जो उनके लिए परमेश्वर की सभी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने पर था (उत्पत्ति 3:16; 12:1-3)। उसका यह निर्णय वही था जैसा एक सहस्राब्दी के बाद प्रेरित पौलुस ने लिया था, जिसकी पृष्ठभूमि बिल्कुल “सही” थी—शिक्षा, सटीकता, और वंश—फिर भी उसने कहा, “मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूँ” (फिलिप्पियों 3:8)।

मूसा ने एक क्रान्तिकारी निर्णय लिया—ऐसा निर्णय जो हम में से कुछ लोगों को भी लेने की आवश्यकता है। शायद आपकी पृष्ठभूमि मूसा के समान है; बचपन से ही आपकी सारी भौतिक जरूरतें बड़ी आसानी से पूरी हुई हैं और इस संसार में आपके पास बहुत बड़ी सफलता की सम्भावनाएँ हैं। हालाँकि, हम जो भी हैं और जहाँ से भी आए हैं, हम सभी को उसी निर्णय का सामना करना पड़ता है जिसका सामना मूसा ने किया था। क्या हम संसार के दोस्त होंगे या परमेश्वर के दोस्त? कोई मध्य मार्ग नहीं है। क्या आज आप संसार के मापदण्डों से जीएँगे, संसार के हँसी-ठट्ठे पर हँसेंगे, संसार की विधियों का पालन करेंगे, और संसार की प्राथमिकताओं को अपनाएँगे? या क्या आप यीशु मसीह के साथ खड़े होंगे, पूरी तरह से विरोध का सामना करेंगे, अपना ध्वज लहराएँगे, और शब्दों तथा कामों से यह स्वीकार करेंगे कि वह आपका प्रभु है? शायद आज वह दिन है जब आपको पहली बार, या लम्बे समय के बाद “विश्वास के द्वारा” जीने और वह क्रान्तिकारी निर्णय लेने की जरूरत है।

लूका 18:18-30

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 105–106; गलातियों 5 ◊


[1] “द पिलग्रिम, अध्याय 33” (1971).

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