“हर एक पहलवान सब प्रकार का संयम करता है; वे तो एक मुरझाने वाले मुकुट को पाने के लिए यह सब करते हैं, परन्तु हम तो उस मुकुट के लिए करते हैं जो मुरझाने का नहीं। इसलिए मैं तो इसी रीति से दौड़ता हूँ, परन्तु लक्ष्यहीन नहीं; मैं भी इसी रीति से मुक्कों से लड़ता हूँ, परन्तु उस के समान नहीं जो हवा पीटता हुआ लड़ता है। परन्तु मैं अपनी देह को मारता कूटता और वश में लाता हूँ।” 1 कुरिन्थियों 9:25-27
कुरिन्थुस में इस्त्मियाई खेलों का आयोजन किया जाता था, जो आकार और महत्त्व में ओलम्पिक खेलों के बाद दूसरे स्थान पर थे। खेल-कूद उस संस्कृति का एक प्रमुख हिस्सा था। कुरिन्थुस के निवासी जानते थे कि किसी दौड़ में लगाया गया प्रयास केवल उसी क्षण का नहीं होता, बल्कि उसके लिए जीवनभर कठोर परिश्रम आवश्यक होता है। इसी कारण जब पौलुस ने कुरिन्थुस की कलीसिया को पत्र लिखा, तो उसने केवल दौड़ने और प्रतिस्पर्धा करने की ही नहीं, बल्कि प्रशिक्षण की भी बात की।
कुरिन्थुस में बच्चों को सात वर्ष की आयु से ही कठोर व्यायाम में लगा दिया जाता था ताकि वे प्रतियोगिताओं के लिए तैयार हो सकें। प्रतियोगियों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे यह प्रमाणित करें कि उन्होंने कठोर प्रशिक्षण लिया है। कोई भी प्रतियोगी महीनों की तैयारी के बिना प्रतियोगिता में दौड़ नहीं पाता था। इसी प्रकार, मसीही जीवन में भी ऐसा अनुशासन दिखना चाहिए जो परमेश्वर की दौड़ को दौड़ने की हमारी शाश्वत प्रतिबद्धता को दर्शाए। हमारे शब्दों का प्रमाण हमारे कार्यों में दिखना चाहिए। यदि हम केवल मसीही जीवन जीने का संकल्प व्यक्त करें, लेकिन उसके अनुसार अनुशासित जीवन न बिताएँ, तो यह व्यर्थ है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति सुबह जल्दी उठने या वजन घटाने का निश्चय करे, लेकिन न तो घड़ी में अलार्म लगाए, न व्यायाम करे और न ही सही आहार अपनाए। उपयुक्त कार्यों के बिना संकल्प का कोई मूल्य नहीं रहता।
जिस अनुशासन की पौलुस चर्चा करता है, वह केवल एक भावना या विचार नहीं है, बल्कि यह एक सचेत, ठोस निर्णय है कि हम अपने समय का उपयोग कैसे करेंगे, किन बातों पर अपना मन लगाएँगे, और अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को कैसे जीएँगे। उन्नीसवीं सदी के अंग्रेज बिशप जे. सी. राइल ने कहा था, “सच्ची पवित्रता . . . केवल आन्तरिक संवेदनाओं और प्रभावों का नाम नहीं है . . . यह ‘मसीह के स्वरूप’ का एक हिस्सा है, जिसे लोग हमारे निजी जीवन, आदतों, स्वभाव, और कार्यों में देख और पहचान सकते हैं।”[1]
प्राचीन काल में, जब कोई विजयी खिलाड़ी अपने नगर लौटता था, तो वह उसी द्वार से प्रवेश नहीं करता था जिससे वह गया था। उसके सम्मान में नगर की दीवार का एक भाग तोड़कर एक नया द्वार बनाया जाता था। वह इस नए द्वार में से प्रवेश करता था और पूरा नगर इकट्ठा होकर उसे सम्मान और जय-जयकार के साथ स्वागत करता था। मसीही जीवन में प्रशिक्षण हमें उद्धार नहीं दिलाता। उद्धार केवल मसीह के द्वारा ही सम्भव है। लेकिन यह हमें स्वर्ग में एक शानदार प्रवेश अवश्य दिला सकता है। जब हम परमेश्वर के राज्य में पहुँचेंगे और प्रभु से सुनेंगे, “धन्य, हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास” (मत्ती 25:21), तो वह सम्मान और आनन्द किसी भी नए बने द्वार से कहीं अधिक महान होगा!
यही वह स्वर्ग में प्रवेश की तस्वीर है, जिसे परमेश्वर का वचन हमारे सामने प्रस्तुत करता है—उन लोगों के लिए जो दौड़ पूरी करते हैं, जो प्रशिक्षण सहते हैं, और जो जीतने के लिए दौड़ते हैं। तो स्वयं से यह प्रश्न पूछें: मैं कहाँ केवल संकल्प व्यक्त कर रहा हूँ, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा? मसीही विकास के किस क्षेत्र में मुझे अनुशासन को अपनाने की आवश्यकता है ताकि मैं अपने प्रभु के और अधिक समान बन सकूँ? और फिर, उस महान क्षण की ओर देखें जब आप अपनी दौड़ पूरी करेंगे और महिमा में प्रवेश करेंगे, क्योंकि वही वह प्रेरणा होगी जो आपको आवश्यक प्रशिक्षण लेने के लिए प्रोत्साहित करेगी।
रोमियों 13:8-14
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 28–29; प्रेरितों 7:1-21
[1] होलीनेस (रिफोमर्ड चर्च पबलिकेशंस, 2009), पृ. 8.