4 मई : यीशु राजा है

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4 मई : यीशु राजा है
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“फिर मैं ने स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे और समुद्र की सब सृजी हुई वस्तुओं को, और सब कुछ को जो उनमें हैं, यह कहते सुना, ‘जो सिंहासन पर बैठा है उसका और मेमने का धन्यवाद और आदर और महिमा और राज्य युगानुयुग रहे!’” प्रकाशितवाक्य 5:13

बाइबल बहुत स्पष्ट रीति से बताती है कि इतिहास एक निश्चित उद्देश्य के साथ एक निश्चित अन्त की ओर बढ़ रहा है। यही सच्चाई बाइबल के दृष्टिकोण की एक अनूठी विशेषता है। दूसरे शब्दों में, मसीही विश्वास इस बात में सबसे अलग है कि सभी चीज़ों का अन्त कैसे होगा।

कई बार जब हम पुरानी तस्वीरें देखते हैं, तो हम खुद से पूछते हैं, “मैं इस तस्वीर में कहाँ हूँ?” या, “क्या मैं इस तस्वीर में हूँ भी?” लेकिन जब बात परमेश्वर की योजना की आती है, तो प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में दिखाए गए इतिहास के चित्र में हर एक व्यक्ति शामिल है। कोई भी इस कहानी से बाहर नहीं है। और जब इतिहास अपने अन्तिम चरण में पहुँचेगा, तो यह विभाजन और अलगाव के साथ समाप्त होगा।

यीशु ने इस विभाजन के बारे में तब बात की जब उसने कहा कि भेड़ें और बकरियाँ अलग की जाएँगी (मत्ती 25:31-46): प्रकाश और अन्धकार अलग किए जाएँगे, और जो यीशु में विश्वास रखते हैं, वे उन लोगों से अलग किए जाएँगे जो उस पर विश्वास नहीं रखते। कोई भी इससे बाहर नहीं होगा, लेकिन दुखद रूप से, कुछ लोग स्वयं को इस आशीष से वंचित करने का चुनाव करेंगे। इसलिए इस बड़े चित्र में हमारी स्थिति महत्त्व रखती है।

इतिहास के उतार-चढ़ाव को इस दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए कि स्वर्ग में एक सिंहासन है, और वह खाली नहीं है; बल्कि उस पर परमेश्वर विराजमान है, जो सब कुछ पर सम्पूर्ण नियन्त्रण किए हुए है। यीशु राजा है, और वह परमेश्वर के दाएँ हाथ पर विराजमान है। भले ही बहुत से लोग अब तक उसके राज्य को न पहचानें, लेकिन इससे यह सच्चाई नहीं बदलती कि वह राज्य करते है।

चौथी शताब्दी के महान धर्मशास्त्री हिप्पोवासी ऑगस्टिन के शब्दों में, मानवजाति के पतन से लेकर समय के अन्त तक दो प्रतिद्वन्द्वी नगर हैं—दो अलग-अलग प्रेम। स्वाभाविक रूप से, हम मनुष्य के नगर में जी रहे हैं, और केवल परमेश्वर की कृपा से ही हम परमेश्वर के नगर में प्रवेश कर सकते हैं और उसके प्रति समर्पित हो सकते हैं।

पृथ्वी का नगर, मनुष्य का नगर, अन्ततः नष्ट हो जाएगा। लेकिन स्वर्गीय नगर, परमेश्वर का राज्य, हमेशा बना रहेगा। क्या हम यीशु को राजा के रूप में स्वीकार करते हैं? इस प्रश्न का उत्तर अनन्तकाल के लिए महत्त्वपूर्ण है। और यह केवल भविष्य के लिए ही नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान जीवन के लिए भी मायने रखता है। यदि यीशु आपका राजा है, तो आप उसकी आज्ञाकारी प्रजा की तरह जीएँगे, भले ही उसकी आज्ञा आपकी इच्छाओं के विरुद्ध क्यों न हो। यदि यीशु आपका राजा है, तो आप सबसे बढ़कर उसके प्रति निष्ठावान रहेंगे, क्योंकि यह संसार आपका स्थाई घर नहीं है—आप तो यहाँ बस यात्री हैं। जैसा कि पौलुस ने लिखा, “हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहाँ से आने की बाट जोह रहे हैं” (फिलिप्पियों 3:20)।

इसलिए सुनिश्चित कर लें कि आप एक उत्तम देश के नागरिक और एक महान राजा की प्रजा के रूप में जीवन जी रहे हैं। हम समस्त सृष्टि के साथ मिलकर उसे आदर देने में अनन्तकाल व्यतीत करेंगे। आज भी, हमारे शब्दों और आचरण से हम यही करें।

भजन 24

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