“जब इस्राएल बालक था, तब मैंने उससे प्रेम किया, और अपने पुत्र को मिस्र से बुलाया। परन्तु जितना वे उनको बुलाते थे, उतना ही वे भागे जाते थे; वे बाल देवताओं के लिए बलिदान करते, और खुदी हुई मूरतों के लिए धूप जलाते गए।” होशे 11:1-2
जब यीशु का जन्म हुआ तो मरियम और यूसुफ उसे राजा हेरोदेस के सताव से बचाने के लिए मिस्र ले गए। जब मत्ती उस घटना के बारे में लिखता है, तो वह होशे के इन शब्दों को सम्मिलित करता है जो सात शताब्दियों से भी पहले कहे गए थे और समझाता है कि वे वास्तव में एक भविष्यद्वाणी थी जिसे यीशु ने पूरा किया (मत्ती 2:13-15)। किन्तु होशे के शब्द किसी व्यक्ति को सन्दर्भित नहीं कर रहे थे, अपितु एक राष्ट्र के बारे में थे (“उनको बुलाते थे . . . वे भाग जाते थे . . . वे बलिदान करते गए”)। तो फिर हो सकता है कि हम यह सोचें कि यहाँ मत्ती ने बिना पूरी तरह से सोचे-समझे पवित्रशास्त्र का उपयोग किया है।
किन्तु वास्तविकता में मत्ती जानता है कि वह क्या कर रहा है। वह जानबूझकर यीशु को इस्राइल के साथ जोड़ रहा है। जैसे परमेश्वर ने अपने प्रिय लोगों, अर्थात् अपने “पुत्र” को मिस्र से बाहर बुलाया था ताकि वे प्रतिज्ञा किए गए देश में उसकी आराधना करें, मत्ती कहता है कि वैसे ही अब परमेश्वर अपने एकलौते पुत्र, प्रभु यीशु को मिस्र से बाहर बुला रहा था और प्रतिज्ञा किए गए देश में वापस ला रहा था। यद्यपि यीशु अलग था। इस्राएलियों के समान उसे जंगल में परीक्षा का सामना करना पड़ा, परन्तु इस्राएलियों के विपरीत उसने पाप नहीं किया (मत्ती 4:1-11; निर्गमन 32:1-6 भी देखें)। यीशु सच्चा इस्राएल है, सच्चा पुत्र है।
अपने सेवाकार्य के आरम्भ में यीशु ने बारह चेलों को चुना (मत्ती 10:1-4)। यह एक महत्त्वपूर्ण संख्या थी। यीशु ने बारह चेलों को चुनकर एक स्पष्ट और महत्त्वपूर्ण सन्देश दिया। वह, सच्चा इस्राएल, लोगों को एक नए इस्राएल का भाग बनने के लिए बुला रहा था। इस्राएल के बारह गोत्रों से उलट, उसके बारह चेले अब इसकी नींव थे। इस चयन में परमेश्वर के लोगों का केन्द्र बदल गया। यह बदलाव पहले हुआ था और अब भी जारी है। तब से सच्चा इस्राएल अब मध्य-पूर्व में नहीं पाया जाता है, न ही इसमें केवल अब्राहम के जैविक वंशज सम्मिलित हैं। इसके विपरीत, इसमें अब्राहम के आत्मिक वंशज सम्मिलित हैं, जो यहूदी और गैर-यहूदी दोनों हैं। परमेश्वर की सन्तान वे हैं जो परमेश्वर की उन प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करके, जो यीशु में पूरी होती हैं, अब्राहम के उदाहरण का अनुसरण करते हैं।
पौलुस कहता है कि प्रतिज्ञा “विश्वास पर आधारित है” और सदा “अनुग्रह की रीति पर” है (रोमियों 4:16)। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप यहूदी हैं या गैर-यहूदी, अमीर हैं या गरीब, पुरुष हैं या स्त्री। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कौन हैं या आपने क्या किया है। एक ही सिद्धान्त सदा लागू होता है कि “यदि तुम मसीह के हो तो अब्राहम के वंश और प्रतिज्ञा के अनुसार वारिस भी हो” (गलातियों 3:29)। हम सब “मसीह में एक हैं” (गलातियों 3:28)। सुसमाचार सभी के लिए समान है क्योंकि क्रूस के तले भूमि समतल है। धार्मिक और नैतिक लोगों को उसी उद्धार की आवश्यकता है जैसे किसी ऐसे व्यक्ति को जो कभी कलीसिया में नहीं जाता और जिसने किसी भी मानक या पंथ के प्रति कोई सम्मान नहीं दिखाया। हमारे पास बताने के लिए केवल एक कहानी है, किन्तु यह वही एकमात्र कहानी है जो हमारे लिए या किसी के लिए भी आवश्यक है।
हम निर्विवाद रूप से असिद्ध हैं। पहले इस्राएल की तरह हम भी अपने पिता से भटकने और मूर्तियों को पूजने के लिए प्रवृत्त हैं। किन्तु यीशु, जो सिद्ध रीति से धर्मी है, बेहतर और सच्चा इस्राएल है, हमारे पापों को उठाने के लिए मर गया ताकि हम आकर उसकी दया पर पूर्ण रूप से अपने आप को डाल दें। हम इस्राएल के सच्चे राज्य की संरचना में उसके महान समुदाय में एक किए गए हैं और यह हमारे वजूद के कारण या हमारे कामों के कारण नहीं हुआ है, बल्कि उसके वजूद के कारण और उसके द्वारा पूरे किए गए काम के कारण हुआ है। आज उस विश्वास के कारण जो मसीह यीशु में है, आप परमेश्वर की सन्तान हैं और उतने ही प्रिय हैं जितना वह था और है (गलतियों 3:26)।
मत्ती 4:1-11