“उसकी महिमा की शक्ति के अनुसार सब प्रकार की सामर्थ्य से बलवन्त होते जाओ, यहाँ तक कि आनन्द के साथ हर प्रकार से धीरज और सहनशीलता दिखा सको, और पिता का धन्यवाद करते रहो, जिसने हमें इस योग्य बनाया कि ज्योति में पवित्र लोगों के साथ मीरास में सहभागी हों।” कुलुस्सियों 1:11-12
लगभग हर व्यक्ति एक अच्छा उपहार पसन्द करता है। परिवार, आज़ादी, छुट्टी, एक गर्म बिछौना और एक ताजगी से भरा पेय, ये सभी हृदय में आभार उत्पन्न कर देते हैं और हम सभी स्वाभाविक रूप से उनके लिए कम से कम कुछ मात्रा में आभार व्यक्त करने में सक्षम होते हैं। “धन्यवाद” ऐसा शब्द है, जिसे हम बचपन में ही सीख जाते हैं।
अमेरिका के प्रसिद्ध जागृति-प्रचारक जॉनथन एडवर्ड्स ने “स्वाभाविक आभार” और “कृपापूर्वक आभार” के बीच अन्तर स्पष्ट करने में सहायक रीति से काम किया।[1] जो वस्तुएँ हमको दी जाती हैं और उनके साथ जो लाभ मिलते हैं, उनके द्वारा स्वाभाविक आभार का आरम्भ होता है। स्वाभाविक आभार कोई भी व्यक्ति व्यक्त कर सकता है। परन्तु कृपापूर्वक आभार बहुत अलग होता है, और केवल परमेश्वर की सन्तानें ही इसका अनुभव कर सकती हैं और इसे व्यक्त कर सकती हैं। कृपापूर्वक आभार परमेश्वर के द्वारा दिए गए किसी भी उपहार या सुख पर ध्यान दिए बिना उसके चरित्र, भलाई, प्रेम, सामर्थ्य और उत्कृष्टता को पहचानता है। वह जानता है कि हमारे पास परमेश्वर के प्रति आभारी होने का कारण है, फिर चाहे हमारा दिन अच्छा हो या बुरा, चाहे हमारे पास काम हो या न हो, चाहे दैनिक समाचार उत्साहजनक हों या पूरी तरह से निराशाजनक, चाहे हम पूरी तरह स्वस्थ हों या किसी घातक बीमारी का सामना कर रहे हों। ऐसा आभार केवल अनुग्रह से ही पाया जाता है, और यह किसी व्यक्ति के जीवन में पवित्र आत्मा का सच्चा चिह्न होता है। कृपापूर्वक आभार हमें इस जागरूकता के साथ सभी बातों का सामना करने में सक्षम बनाता है कि परमेश्वर हमारे जीवन और परिस्थितियों में गहन रूप से जुड़ा हुआ है, क्योंकि उसने हमें अपने प्रेम के विशेष पात्र बनाया है।
जब चेचक के टीके के कारण जॉनथन एडवर्ड्स की मृत्यु हो गई, तो उनकी पत्नी साराह ने अपनी बेटी को लिखा, “मैं क्या कहूँ? एक पवित्र और भले परमेश्वर ने हमें एक काले बादल से ढक दिया है।” इसमें जो सच्चाई है, उसको देखिए। इसमें खुशी या सन्तुष्टि का कोई ऊपरी अप्रिय दिखावा नहीं है। उनके पति की मृत्यु संयोगवश नहीं हुई थी, बल्कि यह उनके परिवार के विरुद्ध निर्णय लेने की परमेश्वर की सम्प्रभुता थी, जिसने जॉनथन को उसके अनन्त पुरस्कार के लिए घर लाने का सही समय निर्धारित किया था। और इसलिए साराह ने आगे लिखा, “किन्तु मेरा परमेश्वर जीवित है; और मेरा हृदय उसके पास है . . . हम सभी परमेश्वर को सौंप दिए गए हैं: और मैं वहीं हूँ, और वहीं रहना पसन्द करती हूँ।”[2]
दुख के समय में हम कभी भी स्वाभाविक आभार के द्वारा ऐसे शब्द नहीं बोल पाएँगे, जो हमें किसी को खो देने के समय सहायता नहीं कर सकते। ऐसी सोच केवल कृपापूर्वक आभार से ही प्रवाहित हो सकती है। हो सकता है कि आप इस समय कठिन या दिल तोड़ देने वाली परिस्थितियों का सामना कर रहे हों; और यदि आप अभी ऐसी परिस्थिति में नहीं हैं, तो कभी न कभी वह दिन अवश्य आएगा क्योंकि हम एक पतित संसार में जी रहे हैं। किन्तु उन क्षणों में आप परमेश्वर के प्रेम से लिपटे रह सकते हैं और परमेश्वर की भलाई पर भरोसा करने को चुन सकते हैं, जो सबसे स्पष्ट रीति से क्रूस पर व्यक्त हुई है। तब सबसे बुरे समय में भी आप उसकी उपस्थिति के आनन्द को जान पाएँगे और आपके पास सदैव उसे धन्यवाद देने का कारण होगा। यह कह सकने में बल, गरिमा और आराधना है, “यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है” (अय्यूब 1:21)।
रोमियों 11:33-36