16 मार्च : व्याकुल मन के लिए शान्ति

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16 मार्च : व्याकुल मन के लिए शान्ति
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“जिनकी [तुम्हारी] रक्षा परमेश्‍वर की सामर्थ्य से विश्वास के द्वारा उस उद्धार के लिए, जो आने वाले समय में प्रगट होने वाली है, की जाती है। इस कारण तुम मगन होते हो, यद्यपि अवश्य है कि अभी कुछ दिन के लिए नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण दुख में हो।”  1 पतरस 1:5-6

दुख के बारे में हमें दो बातें स्वीकार करने की आवश्यकता है, पहली कि दुख वास्तव में होता है,  और दूसरी कि यह कष्ट देता है।  कष्ट हर किसी के जीवन की वह वास्तविकता है, जो कभी न कभी अवश्य ही आता है। ऐसा कष्ट कई रूपों में आता है, जिसमें मानसिक कष्ट सबसे बड़ा है।

संगी विश्वासियों को दुख के बारे में लिखते समय पतरस ने कहा कि दुख अनेक और विभिन्न तरीके से आ सकता है। पतरस के पहले पाठकों को जो विशिष्ट दुख था, वह मानसिक पीड़ा थी जो कठिनाइयों को सहते रहने से आती है, किन्तु पतरस भली-भाँति जानता था कि ऐसी कई प्रकार की परीक्षाएँ होती हैं, जो हमारे मनों को परेशान करती हैं और हमारी आत्माओं को कुचल देती हैं।

सुसमाचार के कारण पतरस अपने लेख का समापन निराशा और हताशा की स्थिति में नहीं करता। इसके विपरीत, वह हमें ऐसी प्रतिज्ञाएँ देता है, जिन पर हम विश्वास कर सकते हैं।

सबसे पहले, पतरस हमें याद दिलाता है कि हमारी परीक्षाएँ केवल “कुछ दिन” के लिए हैं। अब, “कुछ दिन” को अनन्त काल के प्रकाश में समझने की आवश्यकता है। यहाँ तक कि जीवन भर का समय भी सदा काल की तुलना में “कुछ दिन” ही है! इस प्रकार, इस जीवन में कष्ट का एक लम्बा समय भी परमेश्वर की व्यवस्था में और उसकी सन्तानों के लिए उसकी योजना और उद्देश्य के सन्दर्भ में “कुछ दिन” है। इसका अर्थ यह नहीं है कि इस तरह के कष्ट का समय थोड़ा महसूस होगा,  विशेषकर जब हम कष्ट के मध्य में हों। कई लोगों के लिए कष्ट का अर्थ यह होता है कि एक मिनट भी एक दिन जैसा लगता है, एक दिन एक साल जैसा लगता है, और एक साल कभी न समाप्त होने वाला समय लगता है। किन्तु हम इस प्रतिज्ञा से लिपटे रह सकते हैं और हमें रहना भी चाहिए कि हमारी वर्तमान विपत्ति अनन्त काल के लिए हमारा अन्त नहीं है। हो सकता है कि आज आपका जीवन दुख से भरा हो, परन्तु एक दिन, “उस अन्तिम समय में,” आप उद्धार से भर जाएँगे।

दूसरी बात, हम हियाव के साथ कह सकते हैं कि दुख के प्रत्येक क्षण में परमेश्वर उपस्थित होता है। तरसुस के शाऊल के हृदय परिवर्तन के वृतान्त में हम पाते हैं कि यीशु अपने लोगों के दुख के साथ घनिष्ठता से जुड़ा हुआ है। वह कहता है, “हे शाऊल, हे शाऊल, तू मुझे  क्यों सताता है?” (प्रेरितों 9:4, अतिरिक्त महत्त्व जोड़ा गया)। जब यीशु स्वर्ग में था तो वह “मुझे” कैसे कह सकता था? इसका कारण यह था कि आत्मा के माध्यम से मसीह अपने लोगों के साथ उपस्थित था। वह उनके साथ पूर्ण एकता में खड़ा था। जब वे घाटियों से होते हुए अपने अन्तिम उद्धार के दिन की ओर बढ़ रहे थे, उस समय उसका आत्मा उनकी रक्षा करते हुए उनके साथ था। वह हमारे लिए भी ऐसा ही करता है।

आपके पास प्रभु यीशु के रूप में एक महान महायाजक है, जो आपकी निर्बलताओं में आपके साथ दुखी होने में पूरी तरह सक्षम है (इब्रानियों 4:15)। जब इस झूठ पर विश्वास करने का प्रलोभन आपके सामने आए कि परमेश्वर ने आपको छोड़ दिया है या फिर यह कि कोई नहीं समझ सकता कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं या आप क्या झेल रहे हैं, तो आप इस बात में हियाव रख सकते हैं कि “हमारे दिल की कोई धड़कन या कोई पीड़ा ऐसी नहीं है, जिसे वह ऊपर बैठा महसूस नहीं कर सकता।”[1] और आप इस बात में भी हियाव रख सकते हैं कि एक दिन सारा दुख पीछे रह जाएगा और आगे केवल महिमा होगी। यह एक ऐसी सच्चाई है, जिसमें आप आज आनन्दित हो सकते हैं, चाहे आज कुछ भी हो।       

1 पतरस 1:3-9

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