“जब उसके पकड़वाने वाले यहूदा ने देखा कि वह दोषी ठहराया गया है तो वह पछताया और वे तीस चाँदी के सिक्के प्रधान याजकों और पुरनियों के पास फेर लाया और कहा, ‘मैं ने निर्दोष को घात के लिए पकड़वाकर पाप किया है!’ उन्होंने कहा, ‘हमें क्या? तू ही जान।’ तब वह उन सिक्कों को मन्दिर में फेंककर चला गया, और जाकर अपने आप को फाँसी दी।” मत्ती 27:3-5
यीशु को पकड़वाने के बाद यहूदा का क्या हुआ? “उसने अपना मन बदल लिया।” इस वाक्यांश का अनुवाद भी कितनी सहायक रीति से किया गया है, “वह पछताया।” ऐसा लगता है कि उसी क्षण यहूदा का हृदय परिवर्तित हो गया, और इसके साथ ही उसका दृष्टिकोण भी बदल गया।
हम जिस यहूदा को गतसमनी के बगीचे में देखते हैं, जो हथियार लिए लोगों की एक बड़ी भीड़ का नेतृत्व करते हुए यीशु को धृष्टता और निर्लज्ज कटुता के साथ गिरफ्तार कराता है, वह यहूदा नहीं है जिसे हम यहाँ घण्टों बाद प्रधान याजकों और पुरनियों के सामने देखते हैं। उसके कठोर हृदय का स्थान अब पश्चाताप की भावना ने ले लिया है, जिसने उसकी आत्मा को जकड़ लिया है।
एक क्षण के लिए यहूदा के अनुभव के बारे में सोच कर देखें और इसे एक चेतावनी बन जाने दें कि पाप सर्वदा झूठी आशा प्रदान करता है। पाप करने से पहले के क्षण प्रायः उसके बाद के क्षणों से बिल्कुल अलग महसूस होते हैं। यह वही बड़ा बदलाव है, जो आदम और हव्वा ने अपनी अनाज्ञाकारिता के बाद अदन के बगीचे में महसूस किया था। उन्हें उस क्षण में, जब उन्होंने फल खाने का निर्णय लिया, जो कुछ भी पता था और जो कुछ भी उन्होंने उस विद्रोह के कार्य में आशा की थी, वह सब उनके मुँह में धूल बनकर रह गया। (उत्पत्ति 3:6-8)। इसी प्रकार, यीशु को उसके शत्रुओं के हाथों पकड़वाने में जो कुछ भी यहूदा को आकर्षक लग रहा था, वह जल्दी ही उसके लिए कुछ भी नहीं रह गया था।
जब हम पाप करते हैं तो वे सभी मोहक, मादक प्रभाव, जो हमें विद्रोह करने के लिए आकर्षित करते हैं, एक क्षण में ही खत्म हो जाते हैं। जो सोने के समान चमक रहा था वह व्यर्थ वस्तु बन जाती है। केवल यह स्पष्ट तथ्य रह जाता है कि मैंने एक पवित्र, प्रेमपूर्ण परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया है।
इस तरह का परिवर्तनकारी पछतावा होने पर हमारे पास विकल्प यह होता है कि हम पश्चाताप करें और परमेश्वर से मेल कर लें या निराश होकर अपने आप को दोषी ठहराएँ। दुखद रूप से, यहूदा ने बाद वाला विकल्प चुना। उसका अपराध इतना बड़ा था कि निश्चय ही हर चेहरा उसे दोषी ठहरा रहा था, वह जो भी आवाज सुन रहा था वह उसे चुभ रही थी, उसकी आत्मा की हर प्रतिध्वनि उसे दोषी ठहरा रही थी। जो धन उसे दिया गया था, वह उसने प्रधान याजकों को लौटाकर अपने अपराध को कम करने का प्रयास किया, तौभी सिक्कों की थैली का भार अपने ऊपर से हटाकर वह अपने हृदय पर पड़े बोझ नहीं हटा पाया। अपने को अलगाव की इस स्थिति में और किसी प्रकार के सुधार की आशा से परे महसूस करते हुए वह एक भयानक मौत मारा गया। हो सकता है कि आज आप भी अपने पाप के बोझ तले दबा हुआ महसूस कर रहे हों। हो सकता है कि आपने अपने आप सब ठीक करने का प्रयास किया तो हो, किन्तु बोझ अभी भी बना हुआ है। यदि ऐसा है तो यह जान लें कि यहूदा की कहानी को आपकी बनने की आवश्यकता नहीं है। आप मसीह की ओर फिर सकते हैं। वह स्वतन्त्रता और क्षमा प्रदान करता है, एक ऐसा जूआ देता है जो सहज है और एक ऐसा बोझ देता है जो हल्का है (मत्ती 11:28-30)। इसी कारण मसीह मरा कि यहूदा जैसे पापी विश्वासघातियों को छुटकारा दे सके।
अगली बार जब पाप हमें अपनी ओर आने का संकेत करे तो यहूदा का उदाहरण हमारे लिए चेतावनी के रूप में मौजूद है। इस समय कौन से पाप आपको विशेष रूप से लुभा रहे हैं? याद रखें कि वे जैसे पहले दिखाई देते हैं, वे बाद में वैसे नहीं लगेंगे। प्रलोभन के क्षणों के लिए सहायता और अपराध-बोध के क्षणों के लिए आशा उपलब्ध है। परमेश्वर की क्षमा हमारे पछतावे और पश्चाताप की प्रतीक्षा कर रही है। आपको केवल इतना करना है कि उसकी ओर मुड़ें।
भजन संहिता 51