“न अविश्वासी होकर परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर संदेह किया, पर विश्वास में दृढ़ होकर परमेश्वर की महिमा की।” रोमियों 4:20
अब्राहम के सन्तान पैदा होने से पहले ही परमेश्वर ने उससे प्रतिज्ञा की थी कि उसके वंशज संख्या में वृद्धि करके एक विशाल जनसमूह बन जाएँगे। समय बीतता गया और ऐसा लगने लगा कि अब्राहम और उसकी पत्नी सारा को कभी कोई सन्तान नहीं होगी। ऐसा लग रहा था कि प्रतिज्ञा पूरी न हो सकेगी, इसलिए अब्राहम और सारा ने प्रतीक्षा न करते हुए स्वयं ही इस विषय में कुछ करने का निर्णय लिया। सारा ने अपनी दासी हाजिरा को अब्राहम के लिए एक सन्तान उत्पन्न करने का प्रस्ताव दिया और हाजिरा ने एक बच्चे को जन्म दिया, जिसका नाम इश्माएल रखा गया। फिर भी परमेश्वर ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसने जो वंशज देने की प्रतिज्ञा की थी, वे इश्माएल की वंशावली से नहीं आने वाले थे। परमेश्वर अब्राहम और सारा को दिखा रहा था कि यदि उसकी प्रतिज्ञा को पूरा होना है, तो केवल वही इसे पूरा कर सकता है। अब्राहम को एक काम दिया गया और वह था परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर भरोसा करना, एक ऐसी प्रतिज्ञा पर जिसके पूर्ण होने में भारी कठिनाइयाँ थीं और इसलिए उसे पूर्ण करने के लिए एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आवश्यकता थी।
वर्ष बीतते गए और सारा अभी भी गर्भवती न हुई। परमेश्वर फिर से अब्राहम के पास आया और उसे आश्वस्त किया कि इतनी आयु हो जाने के बाद भी सारा एक बेटे को जन्म देगी। अन्ततः, नब्बे साल की आयु में उसने एक पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम इसहाक रखा गया, जिसका अर्थ है “वह हँसता है।” अब्राहम, जो एक बार इसहाक के जन्म की सम्भावना पर सन्देह करते हुए हँसा था (उत्पत्ति 17:17), वह अब निश्चित रूप से विस्मय से अभिभूत था।
परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करता है। नब्बे साल की स्त्री के लिए सन्तान को जन्म देना असम्भव बात है, परन्तु परमेश्वर ऐसा करने में सक्षम है। इस वृद्ध दम्पति को दी गई एक वारिस की प्रतिज्ञा को पूरा होने के लिए अन्य किसी भी बात से बढ़कर जीवन के अलौकिक वरदान की आवश्यकता थी। परमेश्वर के दिव्य हस्तक्षेप के बिना कोई सन्तान नहीं हो सकती थी, अर्थात् कोई जन्म हो ही नहीं सकता था। इसी प्रकार, परमेश्वर के हस्तक्षेप के बिना कोई आत्मिक जीवन नहीं हो सकता। किन्तु उसके सामर्थ्य से एक नया जीवन मिल सकता है, एक सच्चा जीवन! आदि से ही परमेश्वर अपने लोगों को सिखा रहा था कि किसी भी जीवन में सुसमाचार को जड़ पकड़ने के लिए आश्चर्यकर्म की आवश्यकता पड़ती है।
परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाएँ पूरी करता है। और अपने लोगों से की गई उसकी प्रतिज्ञाएँ बहुत सारी हैं, वे सभी शोभायमान हैं और वे सब मसीह में “हाँ” के साथ हैं (2 कुरिन्थियों 1:20)। हमारा काम बसी यही है कि हम वही करें जो अब्राहम ने करना सीखा था, अर्थात् परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करना, भले ही उनका पूरा होना बहुत दूर की बात या असम्भव क्यों न लगता हो। और फिर, एक ऐसी प्रतिज्ञा जिसके पूरे होने में भारी कठिनाइयाँ हों, उसे पूरा करने के लिए एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आवश्यकता होती है, और वही तो वह परमेश्वर है, जिसे आप और मैं पिता कहकर पुकारते हैं।
क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जिसे यह याद दिलाने की आवश्यकता है कि परमेश्वर आज भी अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है? यदि सच कहें तो हम सभी को यह बात याद दिलाए जाने की आवश्यकता है। अब्राहम के समान केवल परमेश्वर पर ही अपनी आशा रखें। वह अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में सक्षम है और केवल उसके सामर्थ्य से ही वे पूरी हो सकेंगी। किन्तु आप तो जानते हैं कि परमेश्वर आश्चर्यकर्म करता है, केवल इतना करें कि आईने में देखें और याद करें कि सितारों को उनके स्थान पर रखने और संसार को बनाए रखने में जिस दिव्य सामर्थ्य की आवश्यकता है, उसी सामर्थ्य ने आपके हृदय को जागृत किया है, आप में विश्वास पैदा किया है और आपको अनन्त जीवन दिया है। उत्पत्ति 15:1-21