“आदम और उसकी पत्नी वाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्वर से छिप गए . . . तब यहोवा परमेश्वर ने पुकारकर आदम से पूछा, ‘तू कहाँ है?’” उत्पत्ति 3:8-9
जातियों, भाषाओं और भौगोलिक सीमाओं से परे, प्रत्येक स्थान पर बच्चे लुका-छिपी खेलने का आनन्द लेते हैं। यह सारे जगत में खेला जाने वाला भोलेपन से भरा एक खेल है। किन्तु इस संसार में लुका-छिपी का पहला खेल न तो मनोरंजक था और न ही भोलेपन से भरा हुआ। वह बहुत ही चिन्ताजनक था।
बगीचे में आदम और हव्वा अपनी अनाज्ञाकारिता के बाद अंजीर के पत्तों के पीछे एक-दूसरे से और बगीचे के पेड़ों के पीछे अपने सृष्टिकर्ता से छिप गए। उन्होंने छिपे रहने का प्रयास किया, परन्तु परमेश्वर इस एक साधारण प्रश्न के साथ उन्हें खोजने आया, “तू कहाँ है?”
यह प्रश्न इस आम धारणा को उलट देता है कि मनुष्य उस परमेश्वर को ढूँढ रहा है, जो जगत में कहीं या उससे भी परे कहीं छिपा हुआ है। इसके विपरीत, हम इसके उलट पाते हैं कि हम ही छिपे हुए हैं और परमेश्वर हमें ढूँढता हुआ आता है।
परमेश्वर द्वारा इन पहले मनुष्यों से पूछा गया ये प्रश्न विचित्र लग सकता है। क्या परमेश्वर पहले से ही सब कुछ नहीं जानता? आदम और हव्वा कहाँ थे, यह प्रश्न परमेश्वर ने इसलिए नहीं पूछा था कि वह नई जानकारी प्राप्त कर सके, परन्तु इसलिए कि वह उन्हें उनकी परिस्थिति को समझने में सहायता करना चाहता था। परमेश्वर उन्हें बाहर निकालने से अधिक उन्हें उजागर करने के लिए आया था।
कल्पना कीजिए कि आदम और हव्वा के विद्रोह के उत्तर स्वरूप परमेश्वर कितने तरीकों से प्रतिक्रिया कर सकता था। यदि उसने न्याय करते हुए कठोरता से उत्तर दिया होता, तो वह उसी क्षण मृत्यु-दण्ड ला सकता था जिसके बारे में उसने उन्हें चेतावनी भी दी थी (उत्पत्ति 2:16-17)। किन्तु सदैव दया करना परमेश्वर के स्वभाव में है, इसलिए वह ऐसा करने के विपरीत केवल एक प्रश्न लेकर आया। मानवजाति द्वारा परमेश्वर से मुँह मोड़ने के बाद यह परमेश्वर के अनुग्रह की पहली झलक है। परमेश्वर ने उन्हें उसी समय वह नहीं दिया जिसके वे योग्य थे; परन्तु अपनी असीम दया में से उसने वह दिया जिसके वे योग्य नहीं थे, अर्थात् प्रत्युत्तर देने और लौट आने का एक अवसर।
हम में से कोई भी सहज महसूस नहीं करेगा यदि हमारे सबसे निकटतम लोग हमारे सभी गुप्त विचारों और किए गए कार्यों को देख सकते। हम एक-दूसरे से और सम्भवतः अपने आप से भी सच्चाई छिपा सकते हैं। परन्तु परमेश्वर से छिपाना व्यर्थ है। न तो छिपाने का कोई तरीका है और न ही किसी और पर दोष मढ़ने का कोई तरीका है।
हमें इस झूठ पर विश्वास नहीं करना चाहिए कि परमेश्वर उन “छोटे” पापों को नहीं देखेगा, जिन्हें हम दूसरों से छिपाते हैं। वह सब देखता है। वह तो हमारी आत्माओं के भीतर देखता है और जानता है कि हमने क्या किया है और हमारी परिस्थिति क्या है। यह बहुत बढ़िया है कि हमें यह दिखावा करने की आवश्यकता नहीं है कि हम कुछ छिपा सकते हैं। वह हम पर दया करने आता है हमारा न्याय करने नहीं, क्योंकि “परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिए नहीं भेजा कि जगत पर दण्ड की आज्ञा दे, परन्तु इसलिए कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए” (यूहन्ना 3:17)। क्या आप किसी सताने वाले पाप या छिपी हुई लज्जा के कारण बोझिल हैं? क्या आप परमेश्वर से भी वह बात छिपाना चाह रहे हैं, जो आप दूसरों से छिपाते रहे हैं? परमेश्वर से छिपाना बन्द करने का सबसे अच्छा समय अब है। ज्योति में आ जाएँ। जो उसके सामने छिपा नहीं रह सकता उसे उजागर करें, ताकि वह उसे अपने लहू से ढक सके और आप जान सकें कि आप को जान लिया गया है और क्षमा कर दिया गया है। वह एक दयालु और बचाने वाला परमेश्वर है, जो हमारे साथ सम्बन्ध स्थापित करने की अभिलाषा रखता है। 1 यूहन्ना 1:8-2:2