3 मार्च : आत्मा में विश्राम

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3 मार्च : आत्मा में विश्राम
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“इसलिए जब कि उसके विश्राम में प्रवेश करने की प्रतिज्ञा अब तक है, तो हमें डरना चाहिए ऐसा न हो कि तुम में से कोई जन उससे वंचित रह जाए। क्योंकि हमें उन्हीं की तरह सुसमाचार सुनाया गया है, पर सुने हुए वचन से उन्हें कुछ लाभ न हुआ; क्योंकि सुनने वालों के मन में विश्वास के साथ नहीं बैठा।”  इब्रानियों 4:1-2

प्रायः मसीही लोग छुट्टी मनाने में तो बहुत कुशल होते हैं, किन्तु वे विश्राम करने में उतने ही खराब होते हैं। ऐसा क्यों है? एक कारण यह हो सकता है कि पश्चिमी संस्कृति सफलता और समृद्धि के उच्चतर स्तरों को लगातार खोजते रहने को बहुत महत्त्वपूर्ण मानती है। यहाँ तक कि हमारा छुट्टी का समय भी “गतिविधियों में व्यस्त रहने” और कुछ न कुछ सुधार करने तथा सफल होने की अभिलाषा से भरा होता है। और इसके पीछे प्रत्येक संस्कृति का रोग छिपा होता है, अर्थात् उस परमेश्वर से हमारा अलगाव जिसने हमें सृजा और हमें काम करने तथा विश्राम करने के लिए बनाया है।

जब से संसार में पाप आया है, तब से विश्राम मानवजाति से लुप्त होता गया है। मानवजाति के बारे में आप चाहे कोई भी अन्य बात क्यों न कहें, फिर भी यह तथ्य निर्विवाद है कि हममें शान्ति या विश्राम दिखाई नहीं देता। यदि शान्ति के कुछ क्षण पाने के लिए आपने अथक परिश्रम किया हो या फिर आप अपने छुट्टी के समय को गतिविधियों से भर देते हैं, तो वह छुट्टी का समय विश्राम करना नहीं है। निश्चित रूप से परमेश्वर कुछ और चाहता है।

परमेश्वर एक ऐसा विश्राम प्रदान करता है, जो हमारी आत्माओं को शान्त करता है। आत्मा में विश्राम उस जीवन से प्रवाहित होता है, जो विश्वास में उसके प्रति समर्पित होता है। जब पाप के कारण आई मृत्यु की धूल मानवजाति पर जम गई, तब से हम उस गहन विश्राम का आनन्द लेने में असमर्थ हो गए जो परमेश्वर ने चाहा था। हमें आवश्यकता है एक नई उत्पत्ति की, और परमेश्वर ने ठीक वही हमें प्रदान कर दिया है! “यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है” (2 कुरिन्थियों 5:17)। सृष्टि के सृजन में परमेश्वर ने शारीरिक विश्राम के सिद्धान्त की स्थापना की और छुटकारे में उसने पूर्ण आत्मिक विश्राम की सम्भावना स्थापित की। फिर भी सभी प्रकार के लोग, जिनमें कुछ मसीही होने का दावा करने वाले लोग भी सम्मिलित हैं, परमेश्वर के प्रति अनादर के साथ अपना जीवन जीने पर अड़े रहते हैं। वे अपनी आत्माओं को विश्राम देने के उसके निमन्त्रण को ठुकरा देते हैं और इस प्रकार केवल वचन के सुनने वाले बने रहते हैं, उस पर चलने वाले नहीं (याकूब 1:22)। और फिर वे मरने पर विश्राम में अपने प्रवेश कर लेने की आशा करते हैं। बाइबल जीवन के प्रति ऐसे दृष्टिकोण को कोई आशा प्रदान नहीं करती है। जिस तरह मरुभूमि में इस्राएलियों के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ व्यर्थ ठहरीं क्योंकि वे उन पर विश्वास करने में विफल रहे, उसी तरह यदि हम भी अपने विश्वास रहित प्रयासों में लगे रहेंगे तो इस जीवन में या आने वाले जीवन में आत्मा में विश्राम प्राप्त करने के परमेश्वर के वरदान को जानने की आशा नहीं कर सकते।

धन्यवाद है कि यीशु में सब कुछ निश्चित हो जाता है। वह खोखले धार्मिक दिखावे और निराशाजनक सांसारिक प्रयासों के मुखौटे को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़कर हमें यह अनुग्रहकारी निमन्त्रण देता है, “हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझसे सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ : और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे” (मत्ती 11:28-29)। यह एक ऐसा विश्राम है जिसका हम काम करते हुए भी आनन्द उठाते हैं, एक ऐसा विश्राम जो वास्तव में हमें हमारे काम से विश्राम पाने में सक्षम बनाता है, और एक ऐसा विश्राम जिसका हम अन्ततः एक दिन पूरी तरह से और अनन्त काल तक उसकी उपस्थिति में आनन्द लेंगे। क्या आपकी आत्मा में आज विश्राम है? या आप इस बात को लेकर चिन्तित हैं कि कल क्या होगा या फिर आपके अनुसार जो आज आपको पा लेना चाहिए था, उसके बारे में सोचते हुए थक गए हैं? वह कार्य जो आपकी सबसे बड़ी अभिलाषा को तृप्ति प्रदान करता है और आपकी सबसे बड़ी आवश्यकता का समाधान करता है, वह उद्धार का कार्य यीशु ने कलवरी में आपकी ओर से पूरा कर दिया था। वह आपको यह जानने के लिए अपने पास आने का निमन्त्रण देता है कि उसने आपके अनन्त भविष्य का समाधान कर दिया है और वे कार्य जो उसने आज आपके लिए निर्धारित किए हैं वे सभी पूरे होकर रहेंगे, न उससे अधिक और न उससे कम। इसलिए उस पर विश्वास  करें और अपनी आत्मा को वास्तव में विश्राम करने दें.  इब्रानियों 4:1-10

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