“मसीह ने जो हमारे लिए शापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के शाप से छुड़ाया, क्योंकि लिखा है, ‘जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह शापित है।’ यह इसलिए हुआ कि अब्राहम की आशीष मसीह यीशु में अन्यजातियों तक पहुँचे, और हम विश्वास के द्वारा उस आत्मा को प्राप्त करें जिसकी प्रतिज्ञा हुई है।” गलातियों 3:13-14
यीशु में विश्वास करने वाले लोगों के रूप में हमें पाप के बड़े अभिशाप से छुटकारा मिल चुका है। इस छुटकारे का आश्चर्य हमें उसी क्षण मोह लेता है जब हम इस बात को समझ जाते हैं कि यह अभिशाप, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर के समक्ष हम दोषी हैं और मृत्यु के योग्य हैं, मसीह के द्वारा हमसे हटा लिया गया है।
बचाए जाने के बाद भी इस आश्चर्य का खत्म हो जाना और इस बात की मनोहरता का कम हो जाना एक सरल बात है। हम इतनी सरलता से सुखद और आरामदायक जीवन जीना आरम्भ कर सकते हैं कि हम पर जो पाप की पकड़ है, उसे देखना कठिन हो जाता है। इतनी सरलता से हम यह मानने लग जाते हैं कि यदि हम अपने वैवाहिक सम्बन्धों, अपनी नौकरी, अपने सम्बन्धों में और अपनी सफलता पर थोड़ा और प्रयास करें तो हम भले लोग बन सकते हैं तथा आशीष के पात्र बन सकते हैं। हम विश्वासी लोग नहीं बनना चाहते, बल्कि सफल व्यक्ति बनना चाहते हैं। निरन्तर हम अपने स्वयं के प्रयासों पर आधारित झूठे धर्म की ओर प्रलोभित होते रहते हैं।
गलातियों की कलीसिया के सामने भी यही प्रलोभन था। इसीलिए पौलुस ने उन्हें लिखा और अनिवार्य रूप से कहा कि मसीही सन्देश यह है ही नहीं। वास्तविकता तो यह है कि यह इसके पूरी तरह उलट है! यदि सुसमाचार यह है कि यीशु केवल हमारे जीवन में व्याप्त किसी कमी को पूरा करने के लिए आया था, तो फिर या तो व्यवस्था का अभिशाप कोई चिन्ता की बात नहीं है या फिर उपचार हो सकने से परे है। किन्तु अभिशाप तो वास्तविक है और इसका समाधान होना भी आवश्यक है। जब तक हम पहले यह नहीं समझ लेते कि हम उस अभिशाप के पात्र हैं, जिसे उसने अपने ऊपर ले लिया तब तक हम किसी ऐसे व्यक्ति में क्यों रुचि लेंगे जो हमारे स्थान पर मर गया?
इस अभिशाप का प्रभाव देखने के लिए हमें केवल मूसा की व्यवस्था को देखने की आवश्यकता है (उदाहरण के लिए, निर्गमन 20:1-17 देखें)। व्यवस्था बताती है कि किस तरह से हमने अपने सम्पूर्ण हृदय से परमेश्वर से प्रेम नहीं किया है। हमने उसकी आज्ञा नहीं मानी है। हमने दूसरों से अपने जैसा प्रेम नहीं किया है। हमने हर बात में सच नहीं बोला है। हम लालच करने के दोषी हैं। यह सूची बहुत लम्बी है। यद्यपि जब परमेश्वर का आत्मा हमें दोषी ठहराता है और हम अपनी कमियों को देखने लगते हैं, तो हम इस भजन के लिखने वाले के साथ गाने लग जाते हैं कि “मेरे हाथों के काम तेरी व्यवस्था की मांगों को पूरा नहीं कर सकते।”[1] हम उस अभिशाप के बोझ को देखते हैं, जो कभी हम पर था और अभी भी हम पर होना चाहिए था, और तब हम मसीह को अपने उद्धारकर्ता के रूप में उसकी सारी महिमा में देखते हैं, जो उस बोझ को ले लेने के लिए आया था।
यह हमारे विश्वास का मूल है। जब हम क्रूस पर दृष्टि करते हैं और देखते हैं कि किस प्रकार से यीशु वहाँ लटका हुआ था, तब हम देख पाते हैं कि उसने जो किया वह आवश्यक था और उसकी अपनी इच्छा से किया गया कार्य था। उसने वह स्थान ले लिया, जहाँ हमें होना चाहिए था। यही अनुग्रह है।
यदि हम अपने प्रयासों से परमेश्वर के साथ अपने आप को सही स्थिति में रखने में सक्षम होते, तो न ही छुटकारे में कोई आश्चर्य होता और न ही लेपालक पुत्र/पुत्रियाँ बनाए जाने के भरोसे में कोई सुन्दरता होती। जब हम अपने आप को और अपने कार्यों को देखने के लिए प्रलोभित होते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि मसीह ने उस अभिशाप को तोड़ दिया है। और उस आश्चर्य में होकर हम महिमा कर सकते हैं। भले ही आपको अनुग्रह की पहली झलक मिले कितना ही समय क्यों न बीत गया हो, आप अभी भी अपने लिए नए सिरे से गा सकते हैं:
मेरे हाथ में कुछ भी नहीं जो मैं लेकर आता हूँ, मैं केवल तेरे क्रूस से लिपटा हुआ हूँ। गलातियों 2:15-3:9