“मैं ने अपने परमेश्वर यहोवा की पूरी रीति से बात मानी। तब उस दिन मूसा ने शपथ खाकर मुझसे कहा, ‘तू ने पूरी रीति से मेरे परमेश्वर यहोवा की बातों का अनुकरण किया है, इस कारण निस्सन्देह जिस भूमि पर तू अपने पाँव धर आया है वह सदा के लिए तेरा और तेरे वंश का भाग होगी।’” यहोशू 14:8-9
बहुत से लोग जीवन में आरम्भ तो बहुत अच्छा करते हैं, परन्तु बाद में वे वह सब खो देते हैं जिसने उन्हें सफल बनाया था। हो सकता है कि युवावस्था में वे विख्यात रहे हों। 40 वर्ष की आयु में उनके जीवन में प्रसिद्धि, प्रभाव और प्रतिष्ठा थी। कलीसिया में, हम ऐसे व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए अत्यन्त उपयोगी व्यक्तियों के रूप में देख सकते हैं, निस्सन्देह हम अपने आप को भी उसी प्रकार देख सकते हैं। परन्तु प्रायः हम बीते हुए कल के विजेता बन कर रह जाने के प्रलोभन में फँस जाते हैं, उन “अच्छे वर्षों” को पीछे मुड़कर देखते रहते हैं और जिस तरह से सारी बातें आज के समय में हो रही हैं, उसके बारे में कुड़कुड़ाते रहते हैं।
यद्यपि यह बात बहुत से लोगों के लिए सच होती है, परन्तु कालेब के लिए यह बात बिल्कुल भी सच नहीं थी, जो इस सम्भावित उदासीनता से दूर रहा और विश्वास में बना रहा। उसने अपनी वृद्धावस्था से पहले के वर्ष अधिक चाहने योग्य परिवेश में नहीं बिताए थे। 40 वर्ष की आयु से वह चार दशकों तक मरुभूमि में भटकता रहा, क्योंकि उसके आस-पास के लोग परमेश्वर में विश्वास करने में विफल रहे थे। फिर भी निराशा और भटकते रहने के इस समय में कालेब कड़वाहट और असन्तोष से मुक्त रहा।
वास्तव में, अन्त में बातें इतनी बिगड़ गईं कि लोगों ने एक ऐसे अगुवे को खोजना आरम्भ कर दिया जो उन्हें पुराने अच्छे दिनों में वापस ले जा सके (गिनती 14:4)। अब, किसी को पीछे जाने के लिए सच में किसी अगुवे की आवश्यकता नहीं होती; आप स्वयं ही पीछे जा सकते हैं! हमें आगे बढ़ाने के लिए अगुवों की आवश्यकता होती है। आगे एक आने वाला कल है। आगे आने वाली कई पीढ़ियाँ हैं। हमारे संसार के लिए परमेश्वर की योजना में अभी भी ऐसे उद्देश्य हैं जिनका हमारे सामने उजागर होना अभी शेष है।
कालेब इसी भावना को प्रकट करता है। उसके आरम्भिक जीवन के स्पष्ट समर्पण का उसके मध्य वर्षों में उसकी निरन्तरता के साथ मिलन हो गया। वह न केवल 40, बल्कि 50, 60 और 70 की आयु में भी समर्पित और अटल रहा। उन सारे दशकों में उसने “पूरी रीति से प्रभु की बातों का अनुसरण किया।”
कई लोगों के लिए विवाह, घर, गृहस्थी, व्यावसायिक चिन्ताएँ, स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ, इत्यादि के क्षेत्र में प्रायः आत्मिक उत्साह और प्रभावशीलता में कमी आ जाती है। ऐसे लोग भी होते हैं जो बहुत सारे संसाधन, ऊर्जा और ज्ञान प्रदान कर सकते हैं, परन्तु ऐसा करने के विपरीत वे सेवाकार्य के काम को अगली पीढ़ी के लिए छोड़कर आराम करने का निर्णय ले लेते हैं। उन इस्राएलियों के समान जो मरुभूमि में थे, वे भी उदासीनता, आलोचना और निराशावाद में ही उलझे रह जाते हैं और अपने आत्मिक जीवन में होने वाली गिरावट को नहीं देख पाते।
आपके समर्पण, आपकी बातचीत और आपकी आत्मिक बढ़त का स्तर आज क्या है? क्या वे पहले जैसी ही हैं? इस्राएल की मरुभूमि वाली पीढ़ी की तरह आज की कलीसिया को भी विश्वास रखने वाले अनुभवी पुरुषों और स्त्रियों की बहुत आवश्यकता है, जो अच्छे और बुरे समय में, प्रत्येक मौसम में और प्रत्येक परिस्थिति में निरन्तर समर्पण के साथ जीवन जीते हों और वर्षों से वे उस मीरास की ओर बढ़ते जा रहे हैं जिसकी प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने विश्वासयोग्य अनुयायियों से की है। आपके लिए आज उस मीरास की ओर चलना कैसा है और दस साल के बाद यह कैसा होगा? न्यायियों 1:1-20