“किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ। तब परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।” फिलिप्पियों 4:6-7
यदि मैं आपसे कहूँ कि इस सप्ताह में या आज के दिन में ही आप जिन बातों को लेकर चिन्तित हैं उन्हें लिखें, तो मुझे लगता है कि आपकी यह सूची बहुत लम्बी होगी। मैं जानता हूँ कि मेरी सूची तो अवश्य ही लम्बी होगी। और फिर भी परमेश्वर का वचन हमसे कहता है, “किसी भी बात की चिन्ता मत करो।” तो फिर, जब हम अपने आप को चिन्ता से जूझते हुए पाते हैं, तो हमें किस प्रकार प्रत्युत्तर देना चाहिए?
पौलुस कहता है कि घुटन भरी चिन्ता का उपाय है प्रार्थना करना और धन्यवाद देना। यह प्रत्युत्तर स्वाभाविक नहीं होता। वास्तव में, यह सीधे-सीधे हमारे पापी हृदयों की प्रवृत्ति के विरुद्ध होता है। हममें से अधिकांश लोगों को चिन्ता उत्पन्न करने वाली बातें प्रार्थना में परमेश्वर के सामने लाने के विपरीत एक कोने में जाकर कुड़कुड़ाना या उन्हें अपने नियन्त्रण में लाने के प्रयास में चिन्ताजनक परिस्थितियों के बारे में सोचते रहना अधिक सरल लगता है। अपने घुटनों पर आकर परमेश्वर को पुकारने के विपरीत, चिन्ता की स्थिति में बने रहकर चिन्ता को हम पर हावी होने देना जितना सरल है, उतना ही निरर्थक भी है।
प्रार्थना हमारे ध्यान को हम पर से हटाकर परमेश्वर के प्रावधान पर लगाने के द्वारा इस प्रश्न को निगल जाती है, “मैं इसका सामना कैसे करूँगा?” प्रार्थना हमारा ध्यान परमेश्वर की ओर मोड़ देती है, जो पूरी तरह से सक्षम है, जो हमारी आवश्यकताओं को अच्छी तरह से जानता है, और जो हमें या तो वह दे देगा जो हम माँगते हैं या उससे भी कहीं अधिक अच्छा देगा, जिसकी हम कल्पना भी न कर सकते। और एक धन्यवादी हृदय हमें परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को स्मरण कराने में सहायता करने के द्वारा बिना किसी कड़वाहट के इस प्रश्न का सामना करने में सहायता करता है, “मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?” वह सदैव एक उद्देश्य के साथ काम करता है, अपनी योजना को पूरा करता है, और पूरी तरह से जानता है कि वह क्या कर रहा है। हममें से कुछ के माता-पिता ऐसे थे जो हमारे घर पर रहने के समय हमारे लिए अलार्म घड़ी का काम करते थे। जब हमें सवेरे किसी निश्चित समय पर जागना आवश्यक होता था, तो हमें अपनी माता या अपने पिता को केवल यह बताना होता था और हमें पूरा भरोसा होता था कि वे हमें जगा देंगे। और फिर, हमें सोने के अतिरिक्त और कुछ नहीं करना होता था! चिन्ता से सामना होने पर पौलुस हमसे इसी तरह का प्रत्युत्तर चाहता है। हमें सीधे अपने स्वर्गिक पिता के पास जाना है और कहना है, “क्या आप मेरे लिए इस स्थिति को सम्भाल लेंगे?” और परमेश्वर सदा यही उत्तर देता है कि मैं इससे निपट लूँगा। मुझ पर भरोसा करो।
जब हम समझ जाते हैं कि परमेश्वर सभी बातों पर नियन्त्रण रखता है, तो हम अपने सभी संघर्षों और चुनौतियों को उसके पास ले जाएँगे। वह जो शान्ति प्रदान करता है, वह हमारे हृदयों के लिए एक दृढ़ गढ़ ठहरेगी।
यद्यपि परेशानियाँ आती हैं और संकट डराते हैं,
यद्यपि घनिष्ठ मित्र हमें निराश कर देते हैं
और शत्रु सभी एक हो जाते हैं, फिर भी एक बात है,
जो हमें सुरक्षित रखती है, चाहे कुछ भी हो,
वह प्रतिज्ञा हमें आश्वस्त करती है कि “प्रभु प्रावधान करेगा।” [1]
तो क्यों न उन बातों की सूची बनाएँ, जिन्हें लेकर आप इस सप्ताह चिन्तित रहे हैं? फिर उनके बारे में प्रार्थना करें, उन परिस्थितियों को स्वर्ग के सिंहासन के सामने ले जाएँ और उन्हें वहीं छोड़ दें। और फिर उसमें लिखी प्रत्येक बात के आगे आप वह लिख सकते हैं, जो परमेश्वर आपसे कहता है, अर्थात् मैं इससे निपट लूँगा। मुझ पर भरोसा करो।
1 पतरस 5:6-11