15 फरवरी : प्रायश्चित्त का दिन

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15 फरवरी : प्रायश्चित्त का दिन
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“क्योंकि शरीर का प्राण लहू में रहता है; और उसको मैंने तुम लोगों को वेदी पर चढ़ाने के लिए दिया है कि तुम्हारे प्राणों के लिए प्रायश्चित्त किया जाए; क्योंकि प्राण के कारण लहू ही से प्रायश्चित्त होता है।”  लैव्यव्यवस्था 17:11

जब परमेश्वर ने इस्राएलियों को मिस्र से छुड़ाया, तो उनके छुटकारे ने परमेश्वर के साथ उनका एक सम्बन्ध स्थापित कर दिया। परमेश्वर की प्रभुता के अधीन रहते हुए लोगों ने मिलाप वाले तम्बू के माध्यम से उसकी उपस्थिति का आनन्द उठाया। परन्तु प्रारम्भ से ही इस्राएली लोग परमेश्वर की व्यवस्था का पालन नहीं कर सके थे। इससे एक दुविधा उत्पन्न हुई कि एक पवित्र परमेश्वर पापी मनुष्यों के साथ कैसे वास कर सकता था?

प्रत्येक वर्ष एक विशिष्ट दिन, जिसे प्रायश्चित्त का दिन कहा जाता था, इस्राएल के महायाजक को परमेश्वर द्वारा परम पवित्र स्थान में प्रवेश करने का निर्देश दिया गया था, अर्थात् मिलाप वाले तम्बू में वह स्थान जहाँ परमेश्वर की उपस्थिति वास करती थी कि वह लोगों के पापों के लिए बलिदान चढ़ाए। महायाजक दो निष्कलंक बकरे लेता था। पहले बकरे को वह लोगों के लिए पापबलि के रूप में बलिदान करता था और फिर उसके लहू को प्रायश्चित्त के ढक्कन पर छिड़कता था, जिसे ‘दया आसन’ के नाम से भी जाना जाता है। इस्राएली अपने पाप के कारण मृत्यु के पात्र थे, किन्तु परमेश्वर ने अपने अनुग्रह में होकर उनके स्थान पर मरने के लिए एक विकल्प के रूप में यह बकरा रखा था। लोग अब जीवित रह सकते थे, क्योंकि वह पशु मारा गया था। और दूसरे बकरे के साथ जो होता था, उसमें इस प्रायश्चित्त का परिणाम देखा जा सकता था। याजक उसके सिर पर हाथ रखता, लोगों के पापों को उस पर लाद देता और फिर उसे मरुभूमि में दूर कहीं छोड़ आता। तब महायाजक लोगों के सामने आकर यह कह सकता था कि तुम्हारे पापों का प्रायश्चित्त हो चुका है। लहू बहाया गया है, और लहू के बहाए जाने से पापों की क्षमा होती है। दूसरे बकरे को मैं मरुभूमि में दूर छोड़ आया हूँ और उसी तरह तुम्हें भी अपने पापों के बारे में चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है और न ही उन्हें अपनी पीठ पर बोझ की तरह ढोना है।  एक बहुत ही विशिष्ट तरीके से परमेश्वर इस महत्त्वपूर्ण सत्य को स्थापित कर रहा था कि वह पापी लोगों को अपनी उपस्थिति में लाने के लिए जो भी आवश्यक है, वह करने को तैयार है।  चूंकि उसके लोग उद्दण्ड थे (और आज भी हैं!), इसलिए उसे ही उनके पापों के लिए एक बलिदान प्रदान करना पड़ा, जिससे वे उसके द्वारा पूरे किए गए कार्य के आधार पर उसके पास आ सकें। और वह प्रत्येक बलिदान अपने आप से परे उस सिद्ध बलिदान की ओर इशारा करता था, जिसे मसीह क्रूस पर अपनी मृत्यु के द्वारा एक बार और सदा के लिए पाप के समाधान के रूप में चढ़ाने वाला था। परिणामस्वरूप हम परमेश्वर के समक्ष हियाव से आने का आनन्द उठा सकते हैं। परन्तु यह हियाव हमारे अपने कारण नहीं है; बल्कि “हमें यीशु के लहू के द्वारा उस नए और जीवते मार्ग से पवित्रस्थान में प्रवेश करने का हियाव हो गया है, जो उसने परदे अर्थात् अपने शरीर में से होकर हमारे लिए अभिषेक किया है” (इब्रानियों 10:19-20)।

जब भी आपको दुविधा और सन्देह हो, या अपने स्वयं के कार्यों को आश्वासन के आधार के रूप में देखने का प्रलोभन हो, तब उन दो बकरों को स्मरण करें, जो आपको क्रूस पर किए गए यीशु के कार्य की ओर दिखाते हैं। आपके पाप का दाम चुका दिया गया है और आपके पाप को हटा दिया गया है। आपका कोई भी कार्य हमारे पवित्र परमेश्वर के सामने आपकी अवस्था में न तो कुछ बढ़ाता है और न ही घटाता है। यह है वह स्थान, जहाँ पर आपको अपने लिए हियाव मिलता है:

एक ऐसे जीवन पर जो मैंने नहीं जिया,

एक ऐसी मृत्यु पर जो मुझे नहीं मिली,

दूसरे के जीवन पर, दूसरे की मृत्यु पर,

मैं अपना पूरा अनन्त काल दाव पर लगाता हूँ।
इब्रानियों 10:11-25

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