13 फरवरी : परम वास्तविकता

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13 फरवरी : परम वास्तविकता
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“परमेश्‍वर जो आकाश का सृजने और तानने वाला है, जो उपज सहित पृथ्वी का फैलाने वाला और उस पर के लोगों को साँस और उस पर के चलने वालों को आत्मा देने वाला यहोवा है, वह यों कहता है : ‘मुझ यहोवा ने तुझको धर्म से बुला लिया है, मैं तेरा हाथ थामकर तेरी रक्षा करूँगा।’”  यशायाह 42:5-6

1932 में ऐल्बर्ट आयनस्टाइन ने कहा था, “इस धरती पर हमारी परिस्थिति अजीब लगती है। हम में से हर कोई यहाँ अनजाने में और बिना बुलाए थोड़े समय के लिए आता है, बिना यह जाने कि ऐसा क्यों और किस उद्देश्य से होता है।”[1] निस्सन्देह आप यह बात आमतौर पर ही सुनते रहते होंगे कि हम संयोग से भरे संसार में जी रहे हैं, जहाँ इतिहास केवल अपने को दोहराता रहता है और ब्रह्माण्ड के अस्तित्व में कोई व्यापक उद्देश्य नहीं है। यदि यह सच बात है, तो जीवन में अभिप्राय पाना कठिन है। फिर तो हमें जीने और मर जाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं करना है।

वास्तविकता के इस दृष्टिकोण से उत्पन्न उद्देश्य की अनुपस्थिति में होकर परमेश्वर बात करता है। वह उस परम वास्तविकता की उद्‌घोषणा करता है, जो सब कुछ बदल देती है। वह अपने बारे में बतलाता है। परमेश्वर अपना परिचय देता है, अपनी पहचान प्रकट करता है। “मैं यहोवा हूँ।” यहाँ परमेश्वर का नाम (“यहोवा”) केवल वह नाम नहीं है, जिससे हम उसे पुकारते हैं; अपितु यह उसके अस्तित्व को व्यक्त करता है। बाइबल में परमेश्वर के कई नाम इस बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी देते हैं कि वह कौन है, जैसे कि अनन्तकालीन, आत्म-निर्भर, सम्प्रभु . . . और भी बहुत कुछ!

बोलते समय परमेश्वर अपनी सामर्थ्य भी प्रकट करता है। आकाश उसकी रचना है और वही है जिसने पृथ्वी को बनाया और उस पर के लोगों को आकार और जीवन दिया है। सृष्टि की स्थिरता और उत्पादकता उसी सृष्टिकर्ता में निहित है। हम अपने आप से घटित होने वाले किसी क्रम-विकास की लहर के उत्पाद नहीं हैं, बल्कि एक रचयिता के प्रत्यक्ष कार्य के फल हैं। परमेश्वर से हटकर हम अपने अस्तित्व को नहीं समझ सकते। न ही हमें कभी ऐसा करना था।

परमेश्वर ने जो कुछ भी रचा है, उसके पीछे उसका उद्देश्य क्या है? उद्धार के द्वारा पृथ्वी पर धार्मिकता स्थापित करना। “मुझ यहोवा ने तुझ को धर्म से बुला लिया है, मैं तेरा हाथ थामकर तेरी रक्षा करूँगा; मैं तुझे प्रजा के लिए वाचा और जातियों के लिए प्रकाश ठहराऊँगा।” वह यहाँ हमसे नहीं परन्तु अपने पुत्र, अर्थात् उस सेवक से बात कर रहा है, जिसका परिचय यशायाह ने दिया है। जब कभी हमें परामर्श की आवश्यकता होती है, मित्रता की आवश्यकता होती है, क्षमा की आवश्यकता होती है, उद्धार की आवश्यकता होती है, तो ऐसे सभी अवसरों के लिए परमेश्वर ने कहा है, “मेरे दास को देखो जिसे मैं सम्भाले हूँ” (यशायाह 42:1)।

हम जीवन में कभी भी उतने सन्तुष्ट नहीं होंगे जितना कि तब होंगे, जब हम मसीह में अपनी परम वास्तविकता को खोज लेंगे। उस वास्तविकता के धाराप्रवाह में हमें हमारा उद्देश्य मिल जाता है, अर्थात् “परमेश्वर की महिमा करना, और उसमें अपने परम आनन्द को समर्पित करना।”[2] यदि आप जीवन में उद्देश्य को जानना चाहते हैं और परिपूर्णता प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपको केवल परमेश्वर की महिमा करते हुए प्रभु के दास को ग्रहण करना है और उसमें आनन्दित होना है, जैसा कि शमौन ने किया था जब उसने इस प्रकार कहा था, “मेरी आँखों ने तेरे उद्धार को देख लिया है, जिसे तू ने सब देशों के लोगों के सामने तैयार किया है कि वह अन्यजातियों को प्रकाश देने के लिए ज्योति और तेरे निज लोग इस्राएल की महिमा हो” (लूका 2:30-32)।  यशायाह 42:1-13

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