“यहोवा उस [यूसुफ] के संग था इसलिए वह भाग्यवान् पुरुष हो गया” उत्पत्ति 39:2
परमेश्वर की सेवा करने के लिए उस स्थान से अच्छा कोई और स्थान नहीं है, जहाँ वह आपको रखता है।
कोई भी नौकरी दोषरहित नहीं होती, कोई भी परिवार दोषरहित नहीं होता, कोई भी परिस्थितियाँ परेशानियों से मुक्त नहीं होतीं। हममें से जो लोग लगातार आदर्श जीवन की खोज करते रहते हैं, जो यह भूल जाते हैं कि सिद्धता को स्वर्ग के लिए सुरक्षित रखा गया है, वे अपने आप को एक ऐसी यात्रा पर ले जाते हैं, जिसमें बार-बार निराशा ही हाथ लगती है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यूसुफ ने जिन परिस्थितियों का अनुभव किया, वे बिल्कुल भी आदर्श परिस्थितियाँ नहीं थीं। अपने पिता से विशेष प्रेम पाने वाले व्यक्ति के रूप में अपना जीवन आरम्भ करने के बाद उसने अपने आप को गुलामों के व्यापारियों के व्यापार की वस्तु के रूप में पाया। उसके परिवार के घर की सुरक्षा का स्थान दासत्व की बेड़ियों ने ले लिया।
यूसुफ के समान हम सभी समय के साथ अपनी परिस्थितियों को बदलते हुए देखते हैं। हो सकता है कि हम लम्बे समय तक जिस घर में रहे हैं, उससे हमें दूर जाना पड़े, या हमारे प्रियजनों को कष्टों का सामना करना पड़े, या वित्तीय कठिनाइयाँ या स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्याएँ अप्रत्याशित रूप से आ जाएँ। तथापि, हममें से बहुत कम लोगों ने यूसुफ की तरह इस प्रकार के त्वरित विनाश का अनुभव किया होगा। (और यदि आपने ऐसा किया है, तो यह जानना कितना उत्साहजनक है कि पवित्रशास्त्र में आपके जैसे लोगों के जीवन में परमेश्वर के हस्तक्षेप की कहानियाँ सम्मिलित हैं!) हम सोच सकते हैं कि यूसुफ के पास कहीं भाग जाने, छिप जाने, हार मान लेने, या प्रतिरोधी बन जाने के सभी कारण मौजूद थे। और फिर भी परमेश्वर की उपस्थिति ने उसे प्रत्येक तराई के स्थान से बाहर निकाला।
यूसुफ को उसकी परिस्थितियों से सुरक्षा नहीं दी गई; उसे अपनी परिस्थितियों में सुरक्षित रखा गया। वह परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा सुरक्षित किया गया था। इसमें हमारे लिए एक सीख है। किसी विश्वासी की कठिनाइयों का सामना करने की क्षमता, ज्ञान या बुद्धि वह वस्तु नहीं है, जो उसकी रक्षा करती है। परन्तु परमेश्वर का सेवक परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा ही सुरक्षित किया जाता है। यह स्वाभाविक बात है कि हम परमेश्वर से अपनी परिस्थितियों को बदलने, बड़ी कठिनाइयों को दूर कर देने या हमें परीक्षाओं से दूर कर देने के लिए कहते हों। हो सकता है कि हम अपने आस-पास देखें और सोचें कि “मैंने कभी इसकी अपेक्षा तो नहीं की थी!” हम इस झूठ पर विश्वास करना आरम्भ कर देते हैं कि यदि हम केवल बच कर भाग निकलें या यदि हमारी समस्याएँ दूर हो जाएँ, तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। किन्तु वास्तविक सच्चाई यह है कि हम चाहे कहीं भी चले जाएँ, समस्याएँ आएँगी और स्वर्ग के इस ओर सिद्धता हाथ नहीं आएगी। जैसा कि भजनकार कहता है कि मेरा भरोसा परमेश्वर पर है (भजन संहिता 11:1)।
परमेश्वर यूसुफ के जीवन को अलग तरीके से व्यवस्थित कर सकता था। इसके विपरीत उसने घटनाओं को वैसे ही घटित होने दिया जिस प्रकार वे घटित हुईं। उसकी योजना थी कि वह अपने सेवक को “बहुत सी विपत्तियों, कठिन कार्यों और प्रलोभन के फन्दों”[1] से होकर निकालेगा। ऐसा नहीं है कि जब वह दासों की पंक्ति में चल रहा था और दासों के बाजार में बैठा था, तब परमेश्वर उसके संग नहीं था और जब वह अपने स्वामी के घराने में सम्मान और प्रमुखता के पद तक ऊपर उठ गया, तब परमेश्वर उसके संग था। प्रभु की उपस्थिति हमारे साथ भी होती है। निस्सन्देह, उसने हमसे प्रतिज्ञा की है कि चाहे तुम तराइयों में हो या पर्वतों के शिखरों पर, “मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ” (मत्ती 28:20)। आज परमेश्वर ने आपको किस परिस्थिति में रखा है? और यह जानना कि वह आपके साथ उस परिस्थिति में है और उसी परिस्थिति में उसके पास आपके करने के लिए एक भला काम है, किस प्रकार से उन परिस्थितियों के बारे में आपके दृष्टिकोण को बदलेगा, जिन्हें आप चुन सकते थे और जिन्हें आप नहीं चुनते?
फिलिप्पियों 4:4-13