“क्योंकि बैरी होने की दशा में उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ, तो फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएँगे?” रोमियों 5:10
परमेश्वर कोई दयालु दादा जी या जगत के सांता क्लॉज़ नहीं है, जो केवल उपहार देता है और जिसे किसी अन्य बात से कोई लेना-देना नहीं है। कदापि नहीं, वह पवित्र है और वह धर्मी है। इसलिए मनुष्य अपने पाप के कारण परमेश्वर की उपस्थिति से निकाले हुए लोग हैं। मानवता और हमारे सृष्टिकर्ता के बीच शत्रुता व्याप्त है। यह ऐसा सन्देश नहीं है, जिसे आप आमतौर पर सुनते हों और यह निश्चित रूप से बहुत सुहावना सन्देश भी नहीं है। किन्तु परमेश्वर उस शत्रुता को अनदेखा नहीं करता। न उसने कभी ऐसा किया है, और न ही वह कभी ऐसा करेगा। पाप के प्रति परमेश्वर के दृष्टिकोण के बारे में पवित्रशास्त्र बहुत स्पष्ट है। निस्सन्देह यह स्पष्ट करते हुए कि पाप हमें परमेश्वर से अलग कर देता है, पौलुस मनुष्यों को परमेश्वर के शत्रुओं के रूप में वर्णित करता है। पौलुस की भाषा भी भजनकार के शब्दों को प्रतिध्वनित करती है, जो परमेश्वर के बारे में कहता है कि “तुझे सब अनर्थकारियों से घृणा है” (भजन 5:5)। यह एक ऐसा सन्देश है, जो न तो पढ़ने में सुखद है और न ही पहली बार देखने पर समझने में सरल है।
तो फिर हमारी आशा कहाँ रही? हम परमेश्वर से मेल-मिलाप कैसे कर सकेंगे? ऐसा कैसे हो सकता है कि परमेश्वर पाप को तो उसके योग्य दण्ड दे और फिर भी पापियों को क्षमा कर दे?
हे हमारे परमेश्वर की प्रेमपूर्ण बुद्धि! जब सब कुछ पाप और शर्म से भरा था,
तब दूसरा आदम लड़ने और बचाने के लिए आ गया। [1]
यीशु ने क्रूस पर अपनी मृत्यु के द्वारा परमेश्वर के न्याय की तृप्ति कर दी है। पहले उसने परमेश्वर की व्यवस्था का पूरी तरह से पालन करने के हमारे दायित्व को और फिर इसमें विफल होने पर हमारे ऊपर पड़ने वाले बोझ को स्वयं अपने ऊपर धारण करने का निर्णय लिया। फिर उसने अपने पापरहित जीवन के द्वारा हमारे दायित्व को पूरा किया और क्रूस पर अपनी बलिदानी मृत्यु के द्वारा हमारे बोझ को निरस्त कर दिया। हमारे पापी अस्तित्व के प्रति परमेश्वर की घृणा के कारण जब परमेश्वर से हमारा अलगाव हुआ, तो उसने हमें त्यागा नहीं। इसके विपरीत, परमेश्वर आया और अपने पुत्र के माध्यम से हमारे साथ मेल-मिलाप किया। यदि यह सबसे अविश्वसनीय समाचार की तरह नहीं लगता है, तो हमने अपने पाप की गम्भीरता, या उसके न्याय की वास्तविकता, या हमारे उद्धार की परिमाण में से किसी एक बात को ठीक से नहीं समझा है।
हममें से वे लोग, जिन्हें मसीही बने हुए कुछ समय बीत चुका है, इसे अच्छी तरह जाने लेने के बाद चाहे इसका तिरस्कार न करें, तौभी आत्म-सन्तुष्टि के शिकार अवश्य हो सकते हैं। परन्तु मसीह की मृत्यु हमारे विश्वास का केवल प्रवेश बिन्दु ही नहीं है; यही हमारा विश्वास है। इसलिए आज उस दूसरे आदम, अर्थात सिद्ध मनुष्य को देखने के लिए ठहरें, जो वहाँ सफल हुआ जहाँ पहला आदम असफल हुआ था और जिसने शैतान को हराकर पतन के प्रभावों को उलट दिया है। यही सुसमाचार है। आपके पापों को क्षमा कर दिया गया है। आपको बचा लिया गया है। जहाँ आप पहले शत्रु थे, अब वहीं आप एक मित्र हैं। मसीह अब आपका भरोसा, आपकी शान्ति और आपका जीवन है।
मसीह में होने की वास्तविकता कोई सहज बात नहीं है; यह एक अद्भुत आश्वस्ति है। जब हम पाप के सामने शक्तिहीन थे, तब मसीह के सामर्थ्य ने हमें स्वतन्त्र किया। जब हम इतना बड़ा ऋण नहीं चुका सके, तब वह आप ही उसे लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया (1 पतरस 2:24)। अब आप स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठे हैं। आज आपकी सबसे बड़ी सफलता भी आपको उससे ऊपर नहीं उठा सकेगी, जितना उसने आपको पहले ही उठा दिया है; न ही आपका सबसे बड़ा संघर्ष या असफलता आपको वहाँ से नीचे गिरा सकती है।
कुलुस्सियों 1:15-23