“[दानिय्येल] अपनी रीति के अनुसार जैसा वह दिन में तीन बार अपने परमेश्वर के सामने घुटने टेककर प्रार्थना और धन्यवाद करता था, वैसा ही तब भी करता रहा।” दानिय्येल 6:10
क्षणिक प्रतिबद्धता कोई बहुत कठिन बात नहीं है। अनुशासनबद्ध स्थिरता हमारे लिए अधिक कठिन होती है, फिर भी वह आत्मिक विकास की कुंजी होती है। हमारी प्रतिबद्धताएँ जो प्रायः कम समय के लिए ही होती हैं, उन्हें अल्पकालिक व्यायाम सम्बन्धी योजनाओं में, बाइबल को कण्ठस्थ करने में, या पुस्तकें पढ़ने की योजनाओं में और नए साल के आगमन पर लिए जाने वाले संकल्पों में देखा जा सकता है। हममें से कितने लोग किसी काम का आरम्भ तो बहुत अच्छी तरह से करते हैं, किन्तु बाद में उसे छोड़ देते हैं! परन्तु इसके साथ-साथ आपने ऐसे लोगों को भी देखा होगा जो अविश्वसनीय रूप से अटल और अनुशासित होते हैं। वे प्रतिदिन एक ही समय अपने कुत्ते को टहलाने निकलते हैं या सदैव इतने सटीक समय पर अपनी चिट्ठियाँ इकट्ठी करते हैं कि आप अपनी घड़ी को उसके अनुसार मिला सकते हैं; और जब वे कोई कार्य करने या कोई नया कौशल सीखने के लिए अपने आप को प्रतिबद्ध कर लेते हैं, तो वे ऐसा इतनी लगन से करते हैं कि आपको कोई सन्देह नहीं रहता कि वे उसे पूरा कर लेंगे।
दानिय्येल एक ऐसा ही व्यक्ति था जिसने प्रार्थना के बारे में ऐसी अनुशासित स्थिरता दिखाई। उसका जीवन ऐसा नहीं था कि एक समय पर तो वह अति-उत्साहित था और फिर लम्बे समय तक वह निष्क्रिय हो गया था। यह स्पष्ट है कि वह प्रार्थना करता था चाहे उसे ऐसा करने का मन हो या न हो। यह सम्भव है कि ऐसे समय भी रहे होंगे जब वह अपने घुटनों से उठकर वास्तव में खुशी महसूस करता होगा और अन्य समय वह सच में उदास महसूस करता होगा, परन्तु फिर भी वह प्रार्थना में लगा रहता था। वह प्रार्थना में निरन्तर लगा रहता था, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों। इसी को अनुशासन कहते हैं!
जब संकट का समय आया तो उसने दानिय्येल की अनुशासित जीवनशैली का सृजन नहीं किया; अपितु उसने उसे प्रकाशित किया। राजा दारा द्वारा एक आदेश जारी करने के बाद, जिसमें तीस दिनों तक उसके अतिरिक्त किसी अन्य देवता या मनुष्य से प्रार्थना करना अवैध था (दानिय्येल 6:7), दानिय्येल राजा के प्रति आज्ञाकारिता को प्रभु के प्रति आज्ञाकारिता के स्थान पर तर्कसंगत ठहरा सकता था। वह यह तर्क दे सकता था कि चूंकि उसने इतने वर्षों की प्रार्थना के बल पर इतना अधिक श्रेय अर्जित कर लिया था, इसलिए एक महीने के लिए उसे छूट दी जा सकती है। परन्तु ऐसा विचार उसके मन में कभी नहीं आया। इसके विपरीत उसने “अपनी रीति के अनुसार” प्रार्थना करना जारी रखा।
निश्चित रूप से उस समय के सबसे शक्तिशाली राजा की आज्ञाकारिता करने के विपरीत इस्राएल के परमेश्वर की आज्ञाकारिता करने में दिखाई गई बहादुरी तथा दानिय्येल के प्रार्थनापूर्ण जीवन के बीच एक सम्बन्ध था। हमारे प्रभु ने हमसे भी यही कहा कि हमें “नित्य प्रार्थना करना चाहिए और हियाव नहीं छोड़ना चाहिए” (लूका 18:1)। यदि हमें प्रार्थना करने का मन न हो या हमारे पास कुछ अवधि के लिए खाली समय न हो, तो भी हमें प्रार्थना करना बन्द नहीं करना चाहिए। यदि हम दबाव में होने पर भी यीशु के लिए जीना चाहते हैं, तो हमें अपनी प्रार्थना में निरन्तरता बनाए रखनी चाहिए। हमें प्रार्थना को अपने विश्वास का केवल एक अच्छा पूरक ही नहीं मानना चाहिए, अपितु उसे विश्वास का एक मौलिक तत्व मानना चाहिए।
आपके लिए भी प्रार्थना के प्रति उसी प्रकार की अटल प्रतिबद्धता दिखाने का द्वार खुला है, जैसी दानिय्येल ने दिखाई थी। नियमित अनुशासन के द्वारा प्रार्थना आपके जीवन की प्रत्येक परिस्थिति के लिए आपकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया बन सकती है। क्या आपके लिए यह आवश्यक है कि आप प्रतिदिन प्रार्थना करने का एक निश्चित समय ठहराएँ और अपने परमेश्वर को धन्यवाद दें, चाहे कुछ भी हो जाए? परमेश्वर हमें जहाँ भी ले जाए, हम जो भी करें, उसकी योजना चाहे जो भी हो, ऐसा हो कि हमारी प्रार्थनाएँ निरन्तरता के साथ होती रहें।
इफिसियों 3:14-21