“तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत करके कहा, ‘मैं अपनी माँ के पेट से नंगा निकला और वहीं नंगा लौट जाऊँगा; यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।’ इन सब बातों में भी अय्यूब ने न तो पाप किया, और न परमेश्वर पर मूर्खता से दोष लगाया।” अय्यूब 1:20-22
कठिनाई में धीरज रखने का सम्भवतः सबसे बड़ा बाइबल का उदाहरण अय्यूब है। एक निष्कलंक और खरा व्यक्ति होने के बाद भी एक ही दिन में उसने अपने बच्चों की मृत्यु देखी और लगभग अपनी सारी सम्पत्ति खो दी। फिर भी, उसकी पहली प्रतिक्रियाओं में से एक यह थी कि बहुतायत और घटी में, आनन्द की परिस्थितियों को लाने में और दुखद परिस्थितियों को लेकर आने में, उसने परमेश्वर की सम्प्रभुता को स्वीकार किया। जब उथल-पुथल, निराशा और कष्ट उस पर छा गए तो उसने अपना सिर मुँड़ा लिया, अपना फटा हुआ बागा पहना और भूमि पर बैठ, न केवल पीड़ा में अपितु आराधना के भाव में उसने ऐसा किया।
उल्लेखनीय रूप से इस कष्ट के अन्धकार में “अय्यूब ने न तो पाप किया और न परमेश्वर पर मूर्खता से दोष लगाया।” इसके विपरीत, अपने आँसुओं में उसने परमेश्वर के प्रावधान पर भरोसा किया। दूसरे शब्दों में, उसने इस बात को पहचाना कि परमेश्वर जानता है कि वह प्रत्येक परिस्थिति में क्या कर रहा है। सबसे कठिन परिस्थितियों में भी परमेश्वर हमारी स्तुति के योग्य है। अय्यूब जानता था कि उसके सब दिन परमेश्वर के हाथों में हैं (भजन संहिता 31:15)।
हममें से अधिकांश लोग व्यथा की चीखों और आँसुओं के कुण्डों से होकर गए हैं। हम जानते हैं कि तूफान के बीच में परमेश्वर की सम्प्रभुता और भलाई का अंगीकार करना कितना कठिन हो सकता है। हमें सन्देह होता है कि वह कहाँ है। कष्ट के प्रति हमारे मानवीय प्रत्युत्तर में हम में परमेश्वर के प्रावधान के बारे में कही गई बातों को नीरस या पुराने ज़माने की बातें समझने का झुकाव होता है, परन्तु ऐसा नहीं है। वास्तव में, समय बीतने या परिस्थितियों के बदलने के साथ हम पीछे मुड़कर देख सकते हैं और पहचान सकते हैं कि ऐसी कोई दुखद परिस्थिति नहीं है, जिसकी अनुमति परमेश्वर ने सम्प्रभुता में होकर न दी हो। वह सभी बातों को अपने हाथों से होकर जाने देता है और उनमें से कोई भी उसे आश्चर्यचकित नहीं करती।
हमें एक-दूसरे के कष्ट को कम नहीं आँकना चाहिए या उनको सहज उत्तर प्रदान नहीं करने चाहिए। इसके विपरीत, हमें कठिनाई के समय में एक-दूसरे को मसीह के समान बनने के लिए प्रेरित करने के लिए बुलाहट दी गई है, एक-दूसरे को स्मरण दिलाते हुए कि परमेश्वर ने हमें अनन्त जीवन और अटल प्रेम दिया है और उसकी चौकसी में हमारे प्राणों की रक्षा हुई है (अय्यूब 10:12)। और निश्चित रूप से हम इतिहास में पीछे देखकर जान सकते हैं कि हमारे परमेश्वर ने इस संसार के अन्धकार में प्रवेश किया है और उस पीड़ा को परख के पूरी तरह समझा है। वह एक ऐसा परमेश्वर है जो जानता है कि मनुष्य को अपने जीवन में कैसा महसूस होता है। वह एक ऐसा परमेश्वर है, जिसने हमारे सामने एक ऐसा भविष्य रखा है जहाँ कोई कष्ट या रोना नहीं है।
जीवन की कठिनाइयों और कष्ट की गहराइयों में भी परमेश्वर का पिता-सदृश प्रावधान हमारी भलाई और उसकी महिमा के लिए सब बातों के होने की अनुमति देता है। उसने यह प्रमाणित कर दिया है कि वह जानता है कि वह क्या कर रहा है। इस कारण हम अन्धकार में भी उसकी स्तुति कर सकते हैं।
भजन संहिता 22