“अरामी लोग दल बाँधकर इस्राएल के देश में जाकर वहाँ से एक छोटी लड़की बन्दी बनाकर ले आए थे और वह नामान की पत्नी की सेवा करती थी। उसने अपनी स्वामिनी से कहा, ‘यदि मेरा स्वामी शोमरोन के भविष्यद्वक्ता के पास होता, तो क्या ही अच्छा होता! क्योंकि वह उसको कोढ़ से चंगा कर देता।’” 2 राजाओं 5:2-3
पीड़ा अपने आप में किसी व्यक्ति को परमेश्वर के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध में नहीं ले जाती। जो लोग परमेश्वर का वचन सुनते तो हैं परन्तु उस पर विश्वास के साथ प्रत्युत्तर नहीं देते, उनके समान हम भी जब विश्वास और आशा के बिना पीड़ा का सामना करते हैं, तो हम कड़वाहट से भर जाएँगे, क्योंकि हमारा हृदय परमेश्वर के प्रति नरम होने के विपरीत कठोर हो जाएगा। दूसरे शब्दों में, पीड़ा हमें या तो परमेश्वर की ओर भागने पर बाध्य कर देगी या उससे दूर कर देगी। परखे जाने पर हमें अपने आप से यह पूछना चाहिए, “क्या यह परीक्षा मुझे कड़वा और कठोर बना रही है, या यह मुझे प्रेमपूर्ण और कोमल बना रही है?”
2 राजाओं की पुस्तक के मध्य में, राजाओं और भविष्यद्वाक्ताओं की कहानियों के बीच, एक छोटी इस्राएली लड़की के उदाहरण के माध्यम से हम बहुत बड़ी व्यथा से सामना होने पर कोमलता और दीनता का एक असाधारण चित्र देखने पाते हैं। अरामी लोग एक आक्रमण के समय इस छोटी लड़की को बन्दी बनाकर ले आए थे; वे उसे उसके परिवार और इस्राएल से दूर ले गए थे और उसे एक अरामी सेनाध्यक्ष नामान की सेवा करने के लिए बाध्य किया गया था। उस छोटी बच्ची और उसके परिवार के लिए यह एक अति-अकल्पनीय त्रासदी थी!
फिर भी, उसकी इतनी अधिक पीड़ा में भी हम उसके कोमल हृदय की एक झलक पाते हैं। यह जानने पर कि उसके स्वामी को कुष्ठ रोग है, इस बच्ची ने नामान की पत्नी को बताया कि वह कैसे ठीक हो सकता है। यदि उसने अपने आप को कड़वाहट से भरने दिया होता, तो जिस समय घर में यह बात फैली थी कि उसका स्वामी बीमार है, वह कहती कि अच्छा हुआ, यह इसी के लायक था। परन्तु उसने ऐसा नहीं किया। वह अपने शत्रु के लिए सबसे उत्तम बात चाह रही थी, न कि सबसे बुरे होने की आशा कर रही थी। यह एक उल्लेखनीय बात है। वह ऐसा कैसे कर पाई थी? क्योंकि सम्भवतः अपने खालीपन और अपने परिवार से अलग हो जाने के दुख से सामना होने पर वह बार-बार अपने प्रेममय परमेश्वर और उसकी प्रतिज्ञाओं की ओर देखती होगी।
जब हम पीड़ा से होकर जा रहे हों और जब हम उन लोगों की सेवा करना चाहते हों जो गम्भीर यातनाओं में हैं, तो हमें एक कोमल और खुले हृदय को विकसित करना नहीं भूलना चाहिए। क्या ऐसा करना सरल होगा? कदापि नहीं! किन्तु परमेश्वर की विश्वासयोग्यता इतनी विस्तृत, इतनी व्यापक है, कि वह हमें हमारी सबसे तीव्र पीड़ा में भी सहारा दे सकती है। इसलिए प्रत्येक परिस्थिति में परमेश्वर की ओर मुड़ें और उसकी विश्वासयोग्यता और प्रावधान द्वारा शान्ति प्राप्त करें। ऐसा करने पर आप “उस शान्ति के कारण जो परमेश्वर हमें देता है, उन्हें भी शान्ति दे सकें जो किसी प्रकार के क्लेश में हों” (2 कुरिन्थियों 1:4)।
2 कुरिन्थियों 5:6-21