“केवल इतना करो कि तुम्हारा चाल–चलन मसीह के सुसमाचार के योग्य हो।” फिलिप्पियों 1:27
प्रति दिन . . . जिस तरह से हम कपड़े पहनते हैं, जिस तरह से हम मुस्कुराते हैं या गुस्सा करते हैं, जिस तरह से हमारा चाल-चलन होता है, हम जो बोलते हैं और हमारे बोलने का लहजा, उसके द्वारा हम सदैव अपने आस-पास के लोगों को बताते रहते हैं कि कौन सी बात वास्तव में महत्त्व रखती है और जीवन वास्तव में क्या है।
मसीहियों के लिए ऐसी अभिव्यक्तियाँ सुसमाचार के अनुरूप होनी चाहिए। इसलिए पौलुस ने फिलिप्पियों को उनके विश्वास और उनके व्यवहार, अर्थात उनके द्वारा अपनाए गए विश्वास वचन और उनके द्वारा प्रदर्शित आचरण के बीच की खाई को पाटने का बुलावा दिया। आज के समय में हमारे लिए मसीह की बुलाहट इससे भिन्न नहीं है। फिर भी, चाहे हम अपने विश्वास में कितने भी परिपक्व क्यों न हों और हम इस खाई को कितना भी क्यों न पाट लें, कुछ न कुछ उससे बढ़कर करने की आवश्यकता सदा बनी रहती है।
पौलुस का वाक्यांश “तुम्हारा चाल-चलन” यूनानी भाषा के क्रिया शब्द politeuesthe से आया है, जिसका अनुवाद अंग्रेजी की NIV बाइबल “तुम्हारा आचरण” के रूप में करती है। इस शब्द का उद्गम polis शब्द से हुआ है, जिसका अर्थ है “नगर,” और यही हमें पुलिस (police) और राजनीति (politics) जैसे अन्य शब्द प्रदान करता है। बहुत वास्तविक अर्थों में, पौलुस मसीही नागरिकता और आचरण को सम्बोधित कर रहा है। जबकि हम अपने आप को परमेश्वर के नगर के वासी समझते हैं, तब हम यह सीखने पाते हैं कि उस दूसरे नगर, अर्थात मनुष्य के नगर में परदेसी और राजदूत के रूप में रहने का क्या अर्थ है। जब हम विश्वास और व्यवहार के बीच की खाई को पाटते हैं, तभी अन्य लोगों को उनके साथ किए गए हमारे व्यवहार के द्वारा स्वर्ग का पूर्वाभास मिल सकेगा।
तो हमारे कार्यों से किस तरह की अभिव्यक्ति होनी चाहिए? केवल इतनी कि मसीह का सुसमाचार प्रेम का सुसमाचार है। हम इसे यूहन्ना के शब्दों में इस प्रकार देखते हैं, “प्रेम इसमें नहीं कि हमने परमेश्वर से प्रेम किया, पर इसमें है कि उसने हमसे प्रेम किया और हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने पुत्र को भेजा। हे प्रियो, जब परमेश्वर ने हमसे ऐसा प्रेम किया, तो हमको भी आपस में प्रेम रखना चाहिए” (1 यूहन्ना 4:10-11)। दूसरे शब्दों में, जैसे परमेश्वर हमसे प्रेम करता है, वैसे ही हमें अपने आस-पास के लोगों से भी प्रेम करना चाहिए। यहाँ तक कि उन लोगों से भी जिन्हें हम या दूसरे लोग अनाकर्षित या अप्रिय मानते हैं, और हमें यह प्रेम आशा और आनन्द के साथ करना चाहिए! प्रेम का यह सन्देश वह चुनौती है जो पौलुस हमें देता है।
केवल तुम्हारे कहे गए शब्दों में ही नहीं,
केवल तुम्हारे द्वारा अंगीकार किए गए कामों में ही नहीं,
परन्तु सबसे अनजानी रीतियों से मसीह प्रकट होता है। [1]
तो आज आप कैसे कपड़े पहनेंगे, आज जब आप मुसकुराएँगे और जब क्रोधित होंगे, आज आपका चाल-चलन कैसा होगा, और आज आपके बोलचाल और उसका लहजा क्या होगा, इन सबके बारे में थोड़ा रुककर सोचें। आप संसार के सामने किस तरह की अभिव्यक्तियाँ प्रदान कर रहे हैं? उन्हें ऐसी होने दें जो प्रेम के सुसमाचार के अनुरूप हों।
1 यूहन्ना 4:7-21